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आज फिर तुमसे उलझने का मन है

आज फिर तुमसे उलझने का मन है

आज फिर तुमसे उलझने का मन है,
प्यार में, तकरार में, दिल के संसार में,
तेरे बाँहों के दरम्यां बिखरने का मन है,
उलझ कर तुमसे ही सुलझने का मन है,

आज फिर तुमसे उलझने का मन है;
भावों की वाहिनी में उतरने का मन है,
तेरे इश्क़ में फिर से सँवरने का मन है,
पत्थर हो गयी थी मैं ज़माने के दस्तूरों से,
पर आज हिम सा मुझे पिघलने का मन है,
आज फिर तुमसे उलझने का मन है;
राख बनकर मिलना ही मुमकिन है अगर,
तो इस इश्क़ की आग में जलने का मन है,
सीमाओं और मर्यादाओं में भी रहते हुए,
आज फिर से इश्क़ में पड़ने का मन है,
आज फिर तुमसे उलझने का मन है;
मंजिल तक के साथी तो सब ही बन जाते हैं, 
पर तेरे संग अंतहीन सफर पर चलने का मन है,
जो सिर्फ अल्फ़ाज़ों में बयां हो वो इश्क़ कैसा,
मुझे तो तेरी आँखों में इश्क़ को पढ़ने का मन है,
आज फिर तुमसे उलझने का मन है;
तेरे एहसासों के साये में लिपटने का मन है,
तेरे प्रेम की लालिमा में निखरने का मन है,
ये अधूरी हस्ती मुझे अब अच्छी नहीं लगती,
तुझमें ही अपने वजूद के सिमटने का मन है,
आज फिर तुमसे उलझने का मन है;
लोग कहते हैं कि इश्क़ में दर्द बहुत होता है,
मुझे इस दर्द के दरिया से गुजरने का मन है,
आजमाइशों की दौलत लेकर आता है इश्क़,
इस दौलत में अपने इश्क़ को परखने का मन है, 
आज फिर तुमसे उलझने का मन है।
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----(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")---
(*हिम= बर्फ, वाहिनी= नदी) 

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