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हम न थे...

हम न थे...

शायद जब दो लोग अपने ज़ज़्बातों को दिल में दबा कर अलग होते होंगे तो ऐसे भी भाव मन में आते होंगे......
ऐसा नहीं कि उनके जज्बातों से हम वाकिफ़ न थे,
पर अरमाँ हमारे जग-ज़ाहिर न थे.
कैसे तोड़ देते अपनी सीमाओं को हम,
जब लब खोलने के ही अधिकार हमको हासिल न थे,
जानते थे कि लोग लड़ जाते हैं अपनी खुशियों के लिये,
पर क्या करें, हम इस कला में भी माहिर न थे;

खुश थे हम उनकी खुशी के लिये,
तो क्या हुआ, जो हम उन खुशियों मे शामिल न थे,
ये किस्मत ही थी जो कुछ पल, हमें साथ उनका मिला,
पर शायद हम ताऊम्र उनके साथ रहने के काबिल न थे,

जानते थे कि मिलना हमारा मुमकिन नहीं,
क्योंकि हम नदिया तो थे, पर वो साहिल न थे;

शायद लड़ सकते थे हम समाज के ठेकेदारों से भी,
पर कैसे, जब वो ही खुलकर हमारी दुनियां में हाज़िर न थे;
देख पाते नहीं बेरुखी अपनों की आँखों में,
आखिर इन्सान थे हम, जादू करने वाले साहिर न थे,
जानते थे कि हममें हैं कमियाँ बहुत,
और खुश रहे वो हमारे साथ, इतने भी हम ताहिर न थे।
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-----(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")----
(*माहिर=निपुण, साहिल=समुद्र या नदी का किनारा, साहिर= जादूगर, ताहिर= गुणी)
मेरी पिछली रचना आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं:- 
"मेरी पहचान"-एक खोज': https://medhajnews.in/news/entertainment/poem-and-stories/My-Identity-A-Discovery