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काश मुझे पता होता

काश मुझे पता होता

काश मुझे पता होता
तो भी कुछ कर पाते क्या?
जो नियति में होना निश्चित है,
हम उसको बदल पाते क्या?
जब कुछ नहीं पता है, 
तो भी है विचलित मन,
पर पता होने पर भी, 
अपने मन को समझा पाते क्या?
जानते हुये भविष्य की बातों को,
सामान्य जीवन बिता पाते क्या?
कुछ प्रिय मिलने वाला है ये जानकर,
अपने उत्साह को संभाल पाते क्या?

कुछ अप्रिय हो जाने की स्थिति में,
अपने मन को बहला पाते क्या?
जैसे आम ज़िन्दगी होती है,
हम उसमें खुद को ढाल पाते क्या?
जो नियति में होना निश्चित है,
हम उसको बदल पाते क्या?
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--(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")--

नोट: मेरी पिछली रचना आप इस लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं- 
आज फिर से  https://medhajnews.in/news/entertainment/poem-and-stories/today-again