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जीवन का सफ़र

जीवन का सफ़र

बहुत बेचैनियाँ मिलती हैं,
ज़िन्दगी जीने के सफ़र में;
पर असली मज़ा होता ही है,
मुश्किल से मिले ज़फ़र में;
अमलन बहुत दुश्कर होता है,
आक़िबत तक हिम्मत रख पाना;
पर दवा में कहाँ होती है वो ताकत,
जो कभी-कभी मिलती है ज़हर में;
सोच समझ कर कदम बढ़ाना चाहिए,
गलतियाँ हो जाती हैं अक्सर बेसबर में;
साथी तो बहुत मिलेंगे राहगुज़र में,
पर एहसास मिलेंगे सिर्फ हमसफ़र में;
दुनियादारी की चिंता दुनिया वालों को करने दे,
तू सिर्फ अच्छा बन खुद और खुदा की नज़र में,
कर मदद दूसरों की तू उनके ज़रर में,
दुआओं का असर तुझे पहुँचाएगा ज़बर में;
पाक नीयत रख बढ़ जीवन की डगर में,
और रब का नाम रखा कर अपने अधर में,
क्योंकि अंत में सब यहीं रह जाएगा एक दिन,
और अकेले ही जाना पड़ेगा तुझे क़बर में
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[ज़फ़र=विजय; अमलन=सच/यथार्थ में; दुश्कर=कठिन, आक़िबत=अंत/परिणाम तक; ज़रर= विपदा/घाव; ज़बर=श्रेष्ठ/प्रभावशाली, पाक=पवित्र, अधर=होंठ]
----(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")----

नोट: मेरी पिछली रचना आप इस लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं-