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पुरुष- भावों की कश्ती हूँ मैं भी

पुरुष- भावों की कश्ती हूँ मैं भी

भावनाओं का ज्वार-भाटा तो,
मेरे मन में भी उठता है,
पर कैसी नज़रे हैं इस दुनिया की, 
कि उन्हें मेरा सख्त रूप ही दिखता है;
क्यों नहीं कर सकता व्यक्त मैं,
खुलकर अपने भावों को?
आखिर मैं भी इंसान ही हूँ,
और मैं भी चाहता हूँ ठहरावों को;
ईश्वर कि अनुपम कृति हूँ मैं भी,
तो ये भेदभाव फिर कैसे आया है,
स्त्री का रोना अगर भावुकता है, तो फिर-
हमारे अश्रुओं को दुर्बलता क्यों बतलाया है?
मैं भी खुलकर हंसना, रोना, कहना 
और जीवन जीना चाहता हूँ,
पर सच तो ये है कि अक्सर, 
ये भावों का सागर मन 
में  ही दबा जाता हूँ;
पुत्र, पति, भाई और पिता के रूप में,
मैंने सदा ही अपना फ़र्ज़ निभाया है,
पर गंभीरता के आवरण ने अक्सर ही,
दुनिया से मेरे भावों को छिपाया है;
दोस्ती की,, तो न्यौछावर कर दिया खुद को,
बना प्रेमी, तो खुद को लुटाया है,
हूँ पुरुष, तो क्या मुझमें हैं भाव नहीं,
आखिर मुझे भी तो ईश्वर ने ही बनाया है;
हर रिश्ते में अपनी मर्यादाओं का,
पूरा भान मुझे भी रहता है,
पर कुछ अपवादों के कारण, सबके 
अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगता रहता है;
किसी रिश्ते की पूर्णता क्या,
मेरे बिना भी कल्पनीय है,
आखिर मानव जीवन की वंश वृद्धि में,
मेरी उपस्थिति भी वांछनीय है;
इसलिए मेरी एक छोटी सी गुज़ारिश है, 
इस समाज और दुनिया वालों से,
अपने नज़रिये के ऐनक को बदलो ज़रा,
व्यक्त करने पर, न घायल करो मुझे सवालों से;
हाँ पुरुष हूँ मैं, और चाहता हूँ स्वतंत्रता,
अव्यक्त को व्यक्त करने की,
और उन भावों का वो ही अर्थ समझा जाये,
जो मैं महसूस करता हूँ व्यक्त करते हुए।
"अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस पर ईश्वर की इस अनुपम कृति को हार्दिक शुभकामनायें!!"
★★★★★
-----(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")----
मेरी पिछली रचना आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं:- 
https://medhajnews.in/news/entertainment/poem-and-stories/you-will-be-unsatisfied-forever