होम > मनोरंजन > कवितायें और कहानियाँ

माँ कहूँ या भगवान

माँ कहूँ या भगवान

देखा है मैंने उसे हरदम,
खुद को तपाते हुए,
हमारी मुस्कराहटों के लिये,
अपनी खुशियाँ लुटाते हुए;
खुद के लिए तो उसने,
कभी सोचा ही नहीं,
बाँट कर अपना हिस्सा,
भी हम लोगों में,
हाँ, देखा है मैंने उसे अपनी,
खाली हथेलियाँ छुपाते हुए;
कैसे हमारे दर्द से आँखें,
उसकी नम हो जाती थीं,
पाया है मैंने अक्सर ,
उसे छुपकर आँसू बहाते हुए;
उसके त्याग और उपकार का तो,
कोई मोल ही नहीं है,
उसने जीवन बिता दिया अपना,
हमें शरीर से इंसान बनाते हुए,
उसे माँ कहूँ या भगवान कहूँ मैं,
दुविधा में हूँ, इसमें अंतर बताते हुए।
******
---(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")---

नोट: मेरी पिछली रचना आप इस लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं- 
अनगिनत हैं...: https://medhajnews.in/news/entertainment/poem-and-stories/are-infinity