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एक बार फिर से ....!!

एक बार फिर से ....!!

एक बार फिर से जीवन में,
नादान बनना चाहते हैं हम;
बचपन की आड़ में खुद को,
गुमराह करना चाहते हैं हम;
गलत-सही क्या है ज़िन्दगी में?
ये हिसाब करना छोड़ना चाहते हैं हम;
कुछ पल के लिए ही सही पर,
दुनियादारी से मुहँ मोड़ना चाहते हैं हम;
फिर से पापा की गोद में चढ़ना और,
माँ के आँचल में सोना चाहते हैं हम;
एक बार फिर से नटखट शरारतें करना,
और बचपन वाला खिलौना चाहते हैं हम;
चिढ़ने-चिढ़ाने पर खुश होते हुए रोना,
और रोते हुए खुश होना चाहते हैं हम;
भाई-बहनों से लड़ते हुए माँ-बाबा की,
डाँट-मार खाना और उनका प्यार पाना चाहते हैं हम;
फ़िर से बारिश के पानी में,
कागज की कश्ती बहाना चाहते हैं हम;
सावन के मौसम में पेड़ों से लटके झूलों पर,
तेजी से झूल जाना चाहते हैं हम;
एक बार फिर से अपना,
बचपन पाना चाहते हैं हम;
जो बीत गया फिर से उसी ज़माने में,
वापस जाना चाहते हैं हम;
फिर से भोलेपन में मुस्कुराना चाहते हैं हम,
जो मिल नहीं सकता अब सपनों में भी,
उसे अब यादों में खोकर फ़िर से पाना चाहते हैं हम;
जिसमें खोकर वापस 'आज' में नहीं आना चाहते हैं हम;
एक बार फिर से बेफिक्री से जीना चाहते हैं हम;
एक बार फिर से ......!!
--(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")---
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नोट: मेरी पिछली रचना आप इस लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं- 
एहसासों की डोर - https://medhajnews.in/news/entertainment/poem-and-stories/thread-of-feelings