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कुछ सच्चा सा

कुछ सच्चा सा

कभी-कभी गैर भी ज्यादा अपने लगते हैं,
वास्तविकता से प्यारे सपने लगते हैं;
पर ऐसे सपनों की उम्र ज्यादा होती नहीं है,
क्योंकि खुश लोग अक्सर ही........
......दुनिया की नज़रों में खटकने लगते हैं;

खुशियों की घड़ी में सब अपने ही होते हैं,
पर ज़रूरत के समय न जाने क्यों?
वो अपने ही गिरगिट की तरह रंग बदलने लगते हैं;
क्यों अपनी खुशियों की कुंजी हाथ में दे हम किसी के?
जो पल भर में ही कभी अपना तो कभी गैर समझने लगते हैं;

उम्मीद न किसी से न ही मदद की दरकार हैं,
क्यों बदलें हम आखिर किसी के लिए?
जब हमारे जीवन पर हमारा ही अधिकार है;
अब तो हम खुद के लिए भी कभी-कभी
सजने और सँवरने लगते हैं;

मतलबपरस्त है ये दुनिया,
न खुश देख पायेगी किसी को;
अब इसे ज़माने की इन्तहा कहें या....
....समाज की नयी रीत, कि आजकल लोग तो,
दूसरों के दुखों से भी जलने लगते हैं;

बहुत कम होते हैं ऐसे लोग जो,
अपना पायें किसी को उनकी कमियों के साथ;
जो हमारे दुःख में दुखी हो और,
हमारी खुशियों में साथ में ही,
हमारे हँसने लगते हैं।

इस भेड़चाल की दुनिया में,
अलग दिखता नहीं है कोई अब,
यहाँ अक्सर ही दिखावे की आँधी में
आगे वाले के पीछे-पीछे ही,
अंधों की तरह सब चलने लगते हैं।
---(कॉपीराइट@भावना मौर्य "तरंगिणी")---

नोट: मेरी पिछली रचना आप इस लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं- 
निगाहें पहरा देती हैं: https://medhajnews.in/news/entertainment/poem-and-stories/eyes-watch