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कभी-कभी बस यूँहीं...!!

 कभी-कभी बस यूँहीं...!!

कभी-कभी बस यूँहीं, 
मुस्कुराने का मन करता है,
मन के भावों को लबों तक, 
लाने का मन करता है,
जो मेरी नज़रों में शायद ही,
तुमने देखा होगा कभी भी,
उसी आशिकी को तुम्हें,
जताने का मन करता है;

जानती हूँ कि तुम भी,
समझते हो मेरे मन को,
पर उन्हीं एहसासों को तुमसे,
सुन जाने का मन करता है,
कभी-कभी यूँहीं, तुम
इस कदर याद आते हो,
कि मेरी कल्पना के हक़ीक़त में, 
ढल जाने का मन करता है;

कुछ राहें तो कभी-कभी,
बेमज़िल ही अच्छी लगती हैं,
जिन पर बेपरवाह-बेवजह,
कदम बढ़ाने का मन करता है,
दिमाग की सौ दलीलों से,
दिल तो परेशां होता है मेरा,
पर कभी-कभी मन की ख़ुशी के लिए,
दिमाग को भूल जाने का मन करता है;

कभी-कभी बस यूँहीं, 
मुस्कुराने का मन करता है,
अपने लिए भी कोई सरगम,
गुनगुनाने का मन करता है,
ख़ामोशी की दुनिया में टहलते हुए,
सबसे गुम जाने का मन करता है,  
अपने लिए भी कुछ लम्हें, 
चुराने का मन करता हैं;

कभी-कभी बस यूँहीं,
हक़ीक़त की सड़क पर,
अपनी कल्पनों के घोड़े भी,
दौड़ाने का मन करता हैं,
अपने ख्यालों की दुनिया में,
घूम आने का मन करता है,
अपने ख्वाबों के दायरों को,
बढ़ाने का मन करता हैं;

कभी-कभी बस यूँहीं...!!
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---(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")---

नोट: मेरी पिछली रचना आप इस लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं- 
इतना तो मेरा हक बनता है:- https://medhajnews.in/news/entertainment/poem-and-stories/that-is-my-right