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सच यही है

सच यही है

हर सुमन हरि पर चढ़े निश्चय नहीं है,
प्रेम पूजा है मगर अभिनय नहीं है;
वक्त पर जो साथ दे साथी वही है,
दोस्ती का और कुछ परिचय नहीं है।
दो दिलों का मेल ही बंधन बहुत है,
सात फेरे घूमना ही परिणय नहीं है;
और बेमन से जोड़े गए रिश्तों का,
कभी भी अच्छा भविष्य संभव नहीं है।
आज हो या कल सही मायनों में,
जीवन के सारे रिश्तों का सच यही है;
ईश्वर भी यहीं हैं और शैतान भी यहीं है,
ये आप पर निर्भर है कि आपको किस पर यकीं हैं?
स्वर्ग भी यहीं हैं और नर्क भी यहीं है;
कौन अच्छा है, कौन बुरा? इसके सारे तर्क भी यहीं हैं;
कहाँ मिलेगा बसेरा इस जीवन के बाद,
ये तो निर्भर है कि किसके कर्म कितने सही हैं?
(सुमन= पुष्प,  हरि= ईश्वर, परिणय=विवाह)
----(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")----

नोट: मेरी पिछली रचना आप इस लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं-