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कहानी- ये आँखे कुछ कहती हैं (भाग-6)

कहानी- ये आँखे कुछ कहती हैं (भाग-6)

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कहानी अब आगे की .....

कहानी- ये आँखे कुछ कहती हैं (भाग-6)

 

अनु की चिल्लाने की आवाज़ आयी- ‘प्लीज रूही को बचाइए।’

 

तभी भव्या और बाकि सभी ने पीछे मुड़ कर देखा तो एक बहुत बड़ा सा पत्थर लुढ़कता हुआ उनकी ओर आ रहा था। इसी दौरान ध्यान बँटने से कार पर पकड़ ढीली हो गयी और उन दंपत्ति के हाँथों से छूटकर और आगे खिसक गयी। भव्या रूही को बचाने के लिए दौड़ कर उस ओर गयी जहाँ रूही खड़ी थी। उसने तेजी से रूही को धक्का दे दिया और रूही थोड़ी दूर जाकर गिरी। तब तक वो तेज़ी से लुढ़कता हुआ पत्थर भव्या के ऊपर से गुजरता हुआ कार से जा भिड़ा। भव्या के शरीर पर बहुत चोटें आई  और वो वहीं बेहोश हो गयी।  वहीं दूसरी ओर कार और पत्थर एक झटके के साथ खाई में जा गिरे और कार के गिरते ही खाई में एक बहुत तेज़ धमाका हुआ जिसकी रोशनी ऊपर तक दिखाई दी। उन बुजुर्ग दंपत्ति और रूही तो कुछ कहने की स्थिति में ही नहीं थे। उस तेज़ रोशनी को रूही ने इतनी करीब से और खुली आँखों से देखा था कि एकदम से गश खाकर वहीं गिर गयी। वो दोनों बुजुर्ग दंपत्ति कभी भव्या को देखते तो कभी रूही को; पर क्या करें कुछ समझ ही नहीं पा रहे थे। वो जानते थे कि रूही तो सिर्फ बेहोश है परन्तु भव्या के ऊपर से पत्थर गुजरने से इतनी गंभीर चोटें हैं कि अगर उसे समय से हॉस्पिटल नहीं पहुँचाया गया तो वो लोग अपने मददगार को भी खो देंगे और कहीं दूर कोई अपने परिवार के किसी सदस्य को। अपने अनु को तो वो खो ही चुके थे पर ये उनका दुर्भाग्य ही था कि समझ नहीं पा रहे थे कि अनु को खोने का दुःख मनाये या रूही और भव्या को बचाने की चिंता करें।  यही सोचते हुए वो दोनों सर पर हाथ रख कर बैठ गए और लगातार रोये जा रहे थे।

 

तभी थोड़ी देर में उन्हें एक पुलिस की वैन दिखाई दी जो उस इलाके की गश्त लिए जा रहे थे। वो दोनों दौड़ पड़े उनसे मदद के गुहार लगाने। पुलिस ने जब घटना स्थल की ओर देखा तो उन्हें स्थिति की गम्भीरता समझते देर न लगी और दो पुलिस वालों को वह छोड़कर बाकियों को लेकर वो हॉस्पिटल की ओर भागे जोकि वहाँ से शायद 5-6 किलोमीटर दूर था। साथ ही वायरलेस पर भी थाने में दुर्घटना की सूचना दी। हॉस्पिटल पहुँचकर फटाफट रूही और भव्या को एडमिट करवाया गया। चूँकि मरीज को स्वयं पुलिसवाले लेकर आये थे तो हॉस्पिटल स्टाफ ने भी तत्परता दिखाई।

 

लगभग कुछ घंटों के बाद पुलिस वालों ने उन बुजुर्ग दंपत्ति को सहानुभूति प्रकट करते हुए उनसे घटनास्थल की सारी जानकारी देने का आग्रह किया क्योंकि उन्हें भव्या के घरवालों का भी पता लगाकर उसके बारे में जानकारी देनी थी। रोते-रोते उन दोनों से सारी बात पुलिसवालों को बताई साथ ही डाक्टरों से ये भी कहा कि प्लीज इस बच्ची की जान बचा लीजिये अगर ये न होती तो शायद हम अनु के साथ-साथ अपनी रूही को भी खो देते। आप पैसों की चिंता बिल्कुल भी न कीजिये बस इस बच्ची को बचा लीजिये। पुलिसवालों और डॉक्टर दोनों ने ही 'हम अपनी पूरी कोशिश करेंगे' कहकर उन्हें हिम्मत बँधायी और फिर पुलिस वालों ने डॉक्टरों से कहा कि यदि उस लड़की (भव्या) का कोई सामान जिससे पहचान की जा सके तो दे दीजिये हम उसके परिवारवालों का पता लगाने की कोशिश करते हैं चूँकि वो पैदल ही आ रही थी मंदिर की ओर से तो जरूर यही आस-पास के इलाज में रहती होगी कहीं। डॉक्टर - "हम चेक करके बताते हैं कहकर' चले गए। फिर थोड़ी देर बाद डॉक्टर एक लॉकेट लेकर आये जो भव्या के गले में था। उसमे भव्या और मृदुल की फोटो थी और डॉक्टर ने ये भी बताया की लड़की के लेफ्ट हैंड की कलाई पर एक टैटू भी है जिसमें इंग्लिश में B&M लिखा हुआ हैं तो इसी से पुलिस वालो ने अनुमान लगाया कि हो न हो इस लड़की या नाम B या M से होगा।

 

पुलिसवाले उन बुजुर्ग दंपत्ति को ये बोलकर वहाँ से चले गए कि जब भी होश आये इसे तो उन्हें इस नंबर (पर्ची पर लिखे नंबर की ओर इशारा करते हुए) पर बता दे। फिर वो आस-पास एक इलाकों में निकल गए पूछताछ करने। इधर हम भी परेशान थे भव्या के मंदिर से लौट कर न आने पर, कुछ देर इंतज़ार किया कि शायद अपनी किसी सहेली के यहाँ गयी हो पर तुम तो जानते ही हो कि उसकी कोई ज्यादा सहेली तो थी नहीं और कहीं न कहीं उसकी दुनिया तुम और हम तक ही सीमित थी। हमारे पास किसी का नंबर भी तो नहीं था। लगभग 4-5 घंटे इंतज़ार करने के बाद हम लोगों ने सोचा कि चलो मंदिर की ओर जाकर देखते हैं शायद अभी मंदिर में ही हो पर तब तक घर की घंटी बजी, जब दरवाजा खोला तो देखा कि सामने पुलिसवाले खड़े हैं और उनके हाथ में भव्या का वही लॉकेट था। उन्होंने उन लॉकेट की तस्वीरों को हमें दिखाते हुए पूछा कि क्या आप इन्हें जानते हैं? फोटो देखते ही हमने हाँ में सिर हिलाया और घबराकर पूछा कि क्या बात है सर? हमारी भव्या ठीक तो है न? उन्होंने हमसे कहा कि- जल्दी चलिए वो एडमिट हैं हॉस्पिटल में और उनकी हालत बहुत नाजुक है। हम सब बदहवास से उनके साथ हॉस्पिटल की ओर भागे। वहाँ पहुँच कर हमने देखा कि भव्या ICU में हैं और उसे ऑक्सीजन लगा हुआ है और उसका पूरा शरीर खून से लथपथ है। हमारे तो आंसू ही नहीं रूक रहे थे पर हमारे हाथों में भी कुछ नहीं था। हमने भव्या के भाई (विशाल) को भी खबर कर दी थी कि भव्या एडमिट है तो उन्होंने कहा कि- आंटी मैं तुरंत निकलता हूँ। पर इतनी दूर हूँ कि कल शाम तक ही पहुँच पाउँगा प्लीज तब तक आप लोग मेरी गुड़िया का ख्याल रखियेगा और रो दिया ये कहकर। फिर हमने तुम्हे फ़ोन मिलाया पर वो नॉट- रिचेबल आ रहा था।

 

इसके बाद हम जाकर उन बुजुर्ग दंपत्ति से मिले तब उन्होंने हमें पूरी बात विस्तार से बताई साथ ही लगातार रोते भी जा रहे थे। हमें उनकी हालत पर बहुत तरस आ रहा था एक ओर उन्होंने अपने होने वाले दामाद को खो दिया दूसरी ओर उनकी बेटी भी हॉस्पिटल में बेहोश पड़ी है। वो लोग इस सोच में हैं कि रूही को होश में आने पर कैसे संभालेंगे?

 

थोड़ी देर बाद डॉक्टर ने बताया कि रूही को होश तो आ गया है पर उसे गहरा सदमा लगा है और साथ ही उसने आँखो की रोशनी खो दी है। रूही को अपनी अंधी आँखों से भी बस खाई से उठती लपटें ही दिखाई दे रहीं थीं जिसमें उसने अपने अनु को खो दिया था। वो लोग भागकर रूही के पास पहुँचे पर डॉक्टर ने रूही से ज्यादा बात करने को मना किया था। सबने जैसे- तैसे एक-दूसरे को संभाला और डॉक्टर ने उसे कुछ दिन वही एडमिट करने को बोला और साथ ही ये भी बताया कि शायद रूही की आँखों की रोशनी वापस आ सकती है पर अभी किसी नेत्र रोग विशेषज्ञ से डिसकस किये बिना कुछ भी कहना जल्दबाजी ही होगी। चूँकि, अभी यहाँ एक अभियान के तहत कुछ नेत्र रोग विशेषज्ञ आये हुए हैं उन्ही से मैं किसी से रूही के केस के बारे में डिसकस करके आप लोगों को थोड़ी देर में बताता हूँ।

 

इधर एक पूरी रात गुजर गयी और भव्या अब भी ICU में ही थी। उसकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी। हालत ऐसी भी न थी कि उसे कहीं और शिफ्ट किया जा सके। बीच-बीच में विशाल का भी फ़ोन आता जा रहा था। फिर अचानक से डॉक्टर आये और बोले कि भव्या……..

 

(जारी अगले भाग में....)

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----(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")---

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