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क्षणिकायें

क्षणिकायें

(1) खामखा 

ये कशिश, ये बेचैनी, ये सब खामखा है;
ये किसकी मौजूदगी का तुझपे असर खामखा है?
जिन रास्तों पर तेरी है कोई मंजिल ही नहीं,
फिर क्यों उन रास्तों पर ठहरी, तेरी ये नज़र खामखा है?
क्यों कुछ दायरों में ही अपनी दुनिया समेट ली है तुमने?
बाहर निकल कर तो देखो, बहुत बड़ा ये जहाँ हैं।
सब अपने तो नहीं हैं, पर कुछ 'अपने से' तो  हैं,
तो क्यों रिश्ते बनाने और निभाने में, ये डर खामखा है?
[खामखा= बेवजह (अकारण), बेचैनी=व्याकुलता, कशिश=आकर्षण, जहाँ=संसार]

(2) बेपनाह

बेपनाह ख़ामोशी भी,
अक्सर बातें हज़ार करती है,
बेपनाह मोहब्बत अक़्सर ही, 
जीना दुश्वार करती है,
बेपनाह मिलता है कुछ तो, 
उसकी कीमत कम हो जाती है,
क्योंकि कम मिलने वाली चीज़ों से ही, 
ये दुनिया सदा ही प्यार करती है।

(3) कभी-कभो ख़ामोशी 

कभी-कभी खामोशियाँ भी,
दिल का हाल कहती हैं,
खामोश सी नज़रें भी, 
लाखों सवाल करती हैं,
लफ़्ज़ों को अक्सर,
यूँही बदनाम किया जाता है,
पर खामोशियाँ भी कभी-कभी,
बड़ा बवाल करती हैं।

(4) बिखरे हुए लम्हों में,

बिखरे हुए लम्हों में,
खुद को परखते हैं हम,
थोड़ा सा बिगड़ते तो,
थोड़ा सा सँवरते हैं हम,
बिखरे हुए लम्हों से,
अब नहीं डरते हैं हम,
बल्कि इन्हें समेटने की,
ही कोशिश करते हैं हम।
और इन्हीं कोशिशों के कारण,
सदा ही निखरते हैं हम।
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---(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")---

नोट: मेरी पिछली रचना आप इस लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं- चल चले वहाँ... https://medhajnews.in/news/entertainment-poem-and-stories-lets-go-there