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आज का श्लोक

आज का श्लोक

गीता श्लोक =कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
                  पृच्छामि त्वां धर्म सम्मूढचेताः।
                 यच्छ्रेयः स्यान्निश्र्चितं ब्रूहि तन्मे
                 शिष्यस्तेSहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।।
भावार्थ: अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं कि मैं अपनी  दुर्बलता के कारण मैं अपना धैर्य खो रहा हूं, हे कृष्णा, मैं अपने कर्तव्यों को भूल रहा हूं। अब आप ही मुझे सही मार्ग  बताओ जो मेरे लिए सबसे अच्छा हो । मैं आपका ही शिष्य हूं और आपकी शरण में आया हूं। कृपया मुझे  मार्गदर्शन करे!
श्लोक का सार =हे श्रीकृष्ण! वेद आपके शरीर के समान हैं, इनमें  से प्रकट ज्ञान आप ही हैं। इसलिए आपको गुरु बनाने की क्या आवश्यकता पड़ी, फिर भी यदि आप गुरु से शिक्षा प्राप्त करने का अभिनय कर रहे हो तो यह केवल आपकी दिव्य लीला ही होगी ।" वास्तव में भगवान श्रीकृष्ण ही जगत के आदि गुरु हैं क्योंकि वे भौतिक संसार के सबसे पहले जन्मे ब्रह्मा के भी गुरु हैं। उन्होंने हमारे कल्याण के लिए यह लीला रची और अपने इस दृष्टांत द्वारा हमें शिक्षित किया कि हमारी आत्मा पर माया हावी है और अज्ञान को दूर करने के लिए हमें गुरु की आवश्यकता है। इस श्लोक मे अर्जुन एक शिष्य के रूप में श्रीकृष्ण के समक्ष आत्मसर्मपण कर उन्हें अपना गुरु स्वीकार करते हुए उसे उचित मार्ग दिखाने के लिए ज्ञान प्रदान करने की प्रार्थना करता है। इसलिए गुरु का पालन करो!
!!जय श्री कृष्णा!!