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जब देखा उसने आइने में

जब देखा उसने आइने में

जब देखा उसने खुद को आइने में,
तो कोई बिछड़ा दिखा उसे;
पहचानने की कोशिश की तो,
वो शख्स, खुद के जैसा ही लगा उसे;

पर उसमें वो पहली बात न थी,
आँखों की चमक चेहरे के साथ न थी,
जो रहती थी रौनक हमेशा उसके चेहरे पे,
अब वह वहाँ नदारद सी थी;

उसका वो साज व श्रृंगार,
वो मोतियों के दमकते हार,
अब नहीं रह गए थे ,
उसके अनोखे पहले प्यार;

वो घंटो तक उसका,
खुद को आईने में निहारना,
मुश्किल होता है अब उसे,
खुद को ही आईने में पहचानना;

अब नहीं रखती वो खुद को,
प्राथमिकताओं की सूची में,
नहीं रह गयी हैं अब,
उसकी चाहतें, उसकी अभिरुचि में;

अब वह समर्पित रह गई है,
बस पने घर और परिवार में,
खुद के लिए ही वक्त नहीं,
उसे खुद के ही संसार में;

अपने कर्तव्य और परिवार में,
वो अक्सर खुद को भुला जाती है,
घर के खुशियों के दीपक की
जलती हुई वह बाती है।
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---(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")---
नोट: मेरी पिछली रचना आप इस लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं- 
अभिलाषा- खुश रहिये!! https://medhajnews.in/news/entertainment/poem-and-stories/a-wish-be-happy