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तुम- मेरी नज़र से

तुम- मेरी नज़र से

तुम- मेरी नज़र से 

खूबसूरती की भीड़ में,
बहुत अलग सी लगी तुम,
सादगी से सजी हुई,
किसी दुल्हन से लगी तुम;
न साज, न श्रृंगार, न दिखावट कोई,
न दिखती है तुझमें मिलावट कोई,
जिसे पाना चाहे मन तहे दिल से,
मुझे तो वही हसरत सी लगी तुम;
जिसे बार-बार पढ़ने से भी,
मन भरता नहीं है,
भावनाओं से लिखे गए,
किसी खत सी लगी तुम;
न कसमें हैं और न हैं वादे कोई,
न बातें बहुत हैं, न हैं मुलाकातें कोई,
फिर भी मेरे सीने में धड़कती,
धड़कन सी लगी तुम;
तुमसे बात करते हुये वक़्त,
पलक झपकते ही गुजर जाता है,
पर इंतज़ार करने बैठे,
तो रुके हुए वक्त सी लगी तुम;
मासूम हो बहुत दिल से,
ये तो जानते हैं हम,
पर जाने क्यों बाहर से,
बहुत सख्त सी लगी तुम;
जिसे माँगू दुआओं में,
दिन-रात मैं खुदा से,
मुझे ऐसी अनमोल,
मन्नत सी लगी तुम;
जिसका साथ रूहानी,
बना दे जिंदगी मेरी,
इस जहाँ में जीती-जागती,
जन्नत सी लगी तुम;
कभी-कभी लगती हो,
उजली किरण सी सफेद,
तो कभी इंद्रधनुष के,
सतरंगी रंग सी लगी तुम;
कभी शांत रहती हो,
न बोलती हो कुछ,
कभी सागर की लहरों में,
उठती उमंग सी लगी तुम;
शरीर बेजान होने लगे,
जिसकी कमी से,
रगों के लिये जरूरी,
उसी रक्त सी लगी तुम;
कुछ तो अच्छे करम थे,
जो मिली तुम मुझे,
कुदरत की हुई खास,
रहमत सी लगी तुम।
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