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इंदौर की महारानी अहिल्याबाई को समर्पित घाट

इंदौर की महारानी अहिल्याबाई को समर्पित घाट

वाराणसी के अधिकांश घाटों का पुनर्निर्माण सन 1700 ईस्वी के बाद किया गया था, जब यह शहर मराठा साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। वर्तमान घाटों के संरक्षक मराठा, शिंदे, सिंधिया, होल्कर, भोंसले और पेशवाई हुए हैं। देश का सबसे पवित्र शहर कहा जाने वाला बनारस ना केवल मंदिर और अपने धार्मिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। हिन्दू धर्म के लोग की मान्यता है की यहां कि पावन पवित्र भूमि पर मरने वालों को मोक्ष प्राप्त होता है। वाराणसी को घाटों और मंदिरों का शहर कहा जाता है। वाराणसी शहर में कुल 88 घाट हैं, ये सभी गंगा नदी के किनारे स्थित है। इनमें से अधिकांश घाटों का इस्तेमाल स्नान और पूजा समारोह के लिए किया जाता है। हर दिन हजारों श्रद्धालु और पर्यटक गंगा नदी में डुबकी लगाने, घूमने और नाव की सवारी के लिए आते है।
इस घाट का निर्माण महाराजा, इंदौर ने करवाया है। यह बहुत ही सुंदर वस्तशिल्प का उदाहरण जो मालवा शैली में बना है। अहिल्याबाई घाट मध्य प्रदेश की महारानी अहिल्याबाई होल्कर को समर्पित है। इतिहासकार बताते हैं कि घाट का प्राचीन नाम केवल गिरिघाट था।
अहिल्याबाई बाड़ा, हनुमान मंदिर व प्राचीन शिव मंदिर बना हैं। महल से गंगा नदी का विहंगम नजारा परिलक्षित होता है। घाट पर उचित स्थान होने की वजह से श्रद्धालु विश्राम करने के अलावा भजन कीर्तन और पूजन के लिए अहिल्याबाई घाट पर आते हैं। 
सन् 1965 में राज्य सरकार के सहयोग से घाट का नवनिर्माण कराया गया था। सरकार ने सभी घाटों का सौंदर्यीकरण और मरमत का कार्य कराया है।