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सोमनाथ ज्योतिर्लिंग दर्शन मात्र से ही मानव जीवन सफल हो जाता है।

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग दर्शन मात्र से ही मानव जीवन सफल हो जाता है।

पुराणों के अनुसार शिवजी जहाँ-जहाँ प्रगट हुए उन बारह स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में पूजा जाता है। ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से ही मानव जीवन सफल हो जाता है। मनुष्य को अपने समस्त पापों से छुटकारा मिल जाता है। भगवान्‌ शिव की कृपा उस पर सदा बनी रहती है। दैहिक, दैविक, भौतिक कष्ट उसके पास नहीं आते भगवान्‌ शंकर की कृपा से वह सारी बाधाओं समस्त रोगों और शोकों से छुटकारा पा जाता है। मनुष्य को परम शांतिदायक शिवधाम की प्राप्ति होती हैं।

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग गुजरात प्रांत के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्र के किनारे सोमनाथ (प्रभासक्षेत्र) नामक मंदिर में यह ज्योतिर्लिंग स्थित है। पुराणों में ज्योतिर्लिंग की कथा का इस प्रकार है। हिमलय के राजा दक्ष प्रजापति की सत्ताइस 27 कन्याएं थीं। उन सभी का विवाह चंद्रदेव के साथ हुआ था। किंतु चंद्रमा का समस्त अनुराग व प्रेम केवल रोहिणी के प्रति ही रहता था। इस से अन्य कन्याएं बहुत अप्रसन्न रहती थीं। उन्होंने अपनी यह व्यथा पिता को सुनाई। दक्ष प्रजापति ने इसके लिए चंद्रदेव को अनेक प्रकार से समझाया। किंतु रोहिणी के वशीभूत उनके हृदय पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

अंत दक्ष ने क्रोध में आकर उन्हें 'क्षयग्रस्त' हो जाने का शाप दे दिया। इस शाप के कारण चंद्रदेव तत्काल क्षयग्रस्त हो गए। उनके क्षयग्रस्त होते ही पृथ्वी पर  उनका सारा कार्य रूक गया। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। चंद्रमा की प्रार्थना सुनकर देवता तथा वसिष्ठ आदि ऋषिगण ब्रह्माजी के पास गए। सारी बातों को सुनकर ब्रह्माजी ने कहा- 'चंद्रमा अपने शाप-विमोचन के लिए अन्य देवों के साथ पवित्र प्रभासक्षेत्र में जाकर मृत्युंजय भगवान्‌ शिव की आराधना करें। उनकी कृपा से अवश्य ही इनका शाप नष्ट हो जाएगा और रोगमक्त हो जाएंगे।

चंद्रदेव ने घोर तपस्या करते हुए दस करोड़ बार मृत्युंजय मंत्र का जप किया। इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव उन्होंने कहा- 'चंद्रदेव! मेरे वर से तुम्हारा शाप-मोचन होगा, साथ ही साथ प्रजापति दक्ष के वचनों की रक्षा भी हो जाएगी।

उन्होंने कहा- कृष्ण पक्ष में प्रतिदिन तुम्हारी एक-एक कला क्षीण होगी, किंतु पुनः शुक्ल पक्ष में उसी क्रम से तुम्हारी एक-एक कला बढ़ जाया करेगी। इस प्रकार प्रत्येक पूर्णिमा को तुम्हें पूर्ण चंद्रत्व प्राप्त होता रहेगा। शाप से मुक्त होकर चंद्रदेव ने अन्य देवताओं के साथ मिलकर भगवान्‌ शिव से प्रार्थना की कि आप माता पार्वतीजी के साथ सदा के लिए यहां निवास करें। भगवान्‌ शिव उनकी इस प्रार्थना को स्वीकार करके ज्योतर्लिंग के रूप में माता पार्वतीजी के साथ इसीस्थान पर स्थापित हो गए। चंद्रमा का एक नाम सोम भी है इसलिए इस ज्योतिर्लिंग को सोमनाथ कहा जाता है