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सिंधिया घाट बनारस

सिंधिया घाट बनारस

वाराणसी उत्तर प्रदेश राज्य का एक प्रसिद्ध शहर है। भगवान शिव की नगरी बनारस को लोग काशी भी कहते हैं। हिन्दू धर्म में भी इसे पवित्र स्थल माना जाता है। यह संसार के प्राचीनतम बसे शहरों में से एक है। वाराणसी की संस्कृति का गंगा नदी के साथ एक अटूट रिश्ता है। बनारस शहर सांस्कृतिक एवं धार्मिक क्रिया कलापो का केन्द्र रहा है।

सिंधिया घाट को वर्ष 1835 ग्वालियर की रानी बैजाबाई सिंधिया ने घाट को  पक्का और स्थाई निर्माण कराया था। जिसके कारण इस घाट को सिंधिया घाट के नाम से जाना जाता है। आजादी के बाद ग्वालियर राजघराने ने  पुन: घाट को निर्मित कराया था।

जब घाट का निर्माण किया किया जा रहा था तो अत्यधिक भार के कारण नदी में आंशिक रूप से डूबा गया था। इससे लगा हुआ शिव मंदिर आंशिक रूप से नदी के जल में डूबा हुआ है। इस घाट के ऊपर काशी के अनेकों प्रभावशाली लोगों द्वारा बनवाये गए मंदिर स्थित हैं। ये संकरी घुमावदार गलियों में भूलभुलैया के भीतर स्थित हैं। मान्यता है की, हिंदू के देवता अग्नि देव का जन्म यहीं हुआ था। यहां पर हिन्दू लोग पुत्र प्राप्ति की कामना के लिए भगवान वीर्येश्वर की पूजा अर्चना करते हैं।

सिंधिया घाट के तटो पर सूर्य की किरणे जब पड़ती है तो वहां का दृश्य मनोरम हो जाता है, जो देखते ही बनती है। घाटों के किनारे सुबह और शाम को नाव की सवारी करने के लिए भारी संख्या में यहां पर्यटक आते हैं।