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श्री बद्रीनारायण मंदिर- जहाँ अलकनंदा नदी के तट पर स्वयं विराजमान है भगवान विष्णु

श्री बद्रीनारायण मंदिर- जहाँ अलकनंदा नदी के तट पर स्वयं विराजमान है भगवान विष्णु

बद्रीनाथ, जिसे ‘बद्रीनारायण मंदिर’ भी कहा जाता है, भारत में उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है। बद्रीनाथ मंदिर को सबसे पवित्र हिंदू मंदिरों में से एक माना जाता है, यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। चार धाम तीर्थ स्थलों में से प्रमुख धाम बद्रीनाथ है। हिमालयी क्षेत्रो में मौसम में अत्यधिक बदलाव की स्थिति के कारण मंदिर हर साल केवल छह महीने (अप्रैल के अंत और नवंबर की शुरुआत के बीच) खुला रहता है और छह माह के लिए जोशीमठ में बद्रीविशाल की पूजा होती है।

बद्रीनाथ मंदिर एक हिंदू मंदिर है, जहां भगवान विष्णु की पूजा होती है, बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास हमें भगवान विष्णु की कई किंवदंतियों को दिखाता है इन किंवदंतियों के अनुसार इसे ‘बद्रीनारायण’ के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर में भक्तों द्वारा कई मूर्तियों की पूजा की जाती है, जिसमे सबसे महत्वपूर्ण विष्णु भगवान की एक मीटर लंबी मूर्ति है। भगवान बद्रीनारायण की मूर्ति काले सालिग्राम से बनी है, इसके साथ ही मंदिर में तुलसी की माला का भी अत्याधिक महत्व है।

आदि गुरु शंकराचार्यजी ने नौवीं शताब्दी में बद्रीनाथ मंदिर को तीर्थ स्थल नगरी के रूप में स्थापित किया। शंकराचार्यजी ने अलकनंदा नदी में बद्रीनारायण की छवि की खोज की और इसे 'तप्त कुंड' (गर्म पानी का झरना) के पास एक गुफा में स्थापित किया। सोलहवीं शताब्दी में, गढ़वाल के राजा ने मूर्ति को वर्तमान मंदिर में स्थानांतरित करवाया । सत्रहवीं शताब्दी में गढ़वाल के राजाओं द्वारा  मंदिर का विस्तार किया गया ।

विष्णु पुराण में बद्रीनाथ की उत्पत्ति का एक और संस्करण बताया गया  है। परंपरा के अनुसार, धर्म के दो पुत्र थे, नर और नारायण- दोनों ही हिमालय पर्वत के आधुनिक नाम हैं। उन्होंने अपने धर्म के प्रसार के लिए पहाड़ी जगह को चुना और उनमें से प्रत्येक ने हिमालय की विशाल घाटियों में शादी की। उनके द्वारा आश्रम को स्थापित करने के लिए वे एक आदर्श स्थान की तलाश में, पंच बद्री के अन्य चार बद्री, जैसे बृधा बद्री, योग बद्री, ध्यान बद्री और भविष्य बद्री में आए। उन्होंने आखिरकार अलकनंदा नदी के तट पर गर्म और ठंडे झरने को ढूंढ लिया और इसका नाम बद्री विशाल रखा।

बद्रीनाथ धाम का उल्लेख विभिन्न हिंदू पवित्र पुस्तकों के साथ-साथ महाभारत में भी मिलता है। पश्चिमी गढ़वाल में एक शिखर की ढलान पर चढ़ते हुए आपको स्वर्गारोहिणी (शाब्दिक अर्थ- 'स्वर्ग की चढ़ाई') के दर्शन होंगे। पांडव बद्रीनाथ और माणा शहर से भी हो कर गुजरे थे, बद्रीनाथ से 4 किमी उत्तर में, माणा में एक गुफा भी मौजूद है, जहां पौराणिक कथाओं के अनुसार व्यास जी ने महाभारत लिखी थी। इस स्थान का उल्लेख कई पुराणों में भी किया गया है, जहां पांडव अपने भाइयों और अपनी पत्नी द्रौपदी के साथ स्वर्ग जाने के लिए रास्ते में रुके थे। वे कुछ समय के लिए उस  गुफा के अंदर भी रुके थे, मंदिर के आसपास कई अन्य पर्यटक आकर्षण भी हैं जो इस क्षेत्र में देवताओं की उपस्थिति का प्रतीक हैं। व्यास और गणेश गुफा जैसे स्थान जहां महाभारत का प्रसिद्ध महाकाव्य ऋषि व्यास और उनके लेखक भगवान गणेश द्वारा लिखा गया था, इस स्थान की आध्यात्मिकता और पौराणिक आकर्षण को भी जोड़ता है।