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200 वर्षों से भी अधिक समय से वीरान पड़े कुलधरा गांव का रहस्मय सच

200 वर्षों से भी अधिक समय से वीरान पड़े कुलधरा गांव का रहस्मय सच

कुलधरा, राजस्थान के जैसलमेर जिले का एक परित्यक्त गाँव है। 13 वीं शताब्दी के आसपास स्थापित, यह कभी पालीवाल ब्राह्मणों का एक समृद्ध गांव था। भयानक अतीत और खंडहर जो एक भयानक भावना उत्पन्न करते हैं। लगभग 200 साल पहले, कुलधरा गाँव एक समृद्ध और शांतिपूर्ण गाँव था, जिसमें ज्यादातर पालीवाल ब्राह्मण रहते थे, जो राजस्थान के क्षेत्रों में एक सम्मानित संप्रदाय है।

कुलधरा गांव स्थल जैसलमेर शहर से लगभग 18 किमी दक्षिण पश्चिम में स्थित है। गांव उत्तर-दक्षिण दिशा में संरेखित 861 मीटर x 261 मीटर आयताकार साइट पर स्थित था। बस्ती देवी माँ के एक मंदिर के आसपास केंद्रित थी। इसकी तीन अनुदैर्ध्य सड़कें थीं, जो कई अक्षांशीय संकरी गलियों से कटी हुई। शहर की दीवार के अवशेष साइट के उत्तर और दक्षिण की ओर देखे जा सकते हैं। शहर का पूर्वी भाग छोटी काकनी नदी के सूखे-नदी के तल का सामना करता है। पश्चिमी भाग मानव निर्मित संरचनाओं की पिछली दीवारों से सुरक्षित था।

कुलधरा का रहस्यमय सच

कुलधरा गांव के वीरान होने के पीछे एक अजीबोगरीब रहस्यमय कहानी है। स्थानीय लोगो के अनुसार, आज से लगभग 200 साल पहले, जब कुलधरा गाँव  खंडहर होकर, आसपास के 84 गांव के पालीवाल ब्राह्मणों का निवास स्थान हुआ करता था। इस रियासत का दीवान सालम सिंह एक बहुत अय्याश व्यक्ति था। दीवान सालम सिंह की गंदी नजर गांव के ब्राम्हण कि एक खूबसूरत लड़की पर पड़ गयी। दीवान उस लड़की के पीछे पागल हो गया था कि, वह तो बस उसे किसी भी तरह से पाना चाहता था। उसने इसके लिए ब्राह्मणों पर दबाव बना कर उन्हें परेशान करना शुरू कर दिया। जब उससे भी उसका मन नहीं भरा तो उसने उस लड़की के घर यह संदेश भिजवाया कि यदि अगले पूर्णमासी तक उसे वह लड़की नहीं मिली तो उसके बाद वह उस लड़की को उठा ले जाएगा।

अब बात गांव के आत्मसम्मान पर आगयी थी। गांव के मंदिर में सभा बुलाई गयी  और पालीवाल ब्राह्मणों की बैठक हुई, जिसमे ये निष्कर्ष निकला की 5000 से ज्यादा परिवारों ने अपने सम्मान के लिए रियासत को छोड़ने का फैसला लिया। उसी की अगली शाम कुलधरा गांव हमेशा के लिए वीरान हो गया। ऐसा कहा जाता है की गांव को छोड़ते वक्त उन पालीवाल ब्राह्मणों ने कुलधरा गांव को श्राप दिया था। आज परिंदे भी उस गांव की सरहदों में दाखिल नहीं होते। इस घटना के बाद और बदलते वक्त के साथ 82 गांव तो दोबारा बस गए लेकिन दो गांव कुलधरा और खाभा तमाम कोशिशों के बाद आज भी वीरान ही हैं। ये गांव अब भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में हैं।

ऐसा माना जाता है की उन पालीवाल ब्राह्मणों के श्राप से यह गांव रूहानी ताकतों के कब्जे में हो गया है। टूरिस्ट प्लेस में पूरी तरह से तब्दील हो चुके कुलधरा गांव घूमने आने वालों पर्यटकों और स्थानीय लोगो के मुताबिक यहां रहने वाले पालीवाल ब्राह्मणों की आहट आज भी सुनाई देती है। यहाँ पर ऐसा अनुभव होता है कि कोई आपके आसपास चल रहा है। बाजार के चहल-पहल की आवाजें सुनाई देती हैं, ऐसा लगता है की जैसे महिलाएं आपस में बातचीत कर रही हों और उनकी चूड़ियों और पायलों की आवाज़ें हमेशा ही आती रहती है। प्रशासन ने कुलधरा गांव की सरहद पर एक फाटक भी बनवा दिया है, जिसके पार दिन में तो सैलानी घूमने आते रहते हैं लेकिन रात में इस फाटक को पार करने हिम्मत किसी में भी नहीं है।