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शब्द बोलते हैं-2

शब्द बोलते हैं-2

कुछ अधूरी कवितायें पूरे भावों के साथ...

(1)
शब्द बोलते हैं, अक्सर मैंने सुना है,
इनसे बातें करते हुये, कितनी ही नज़्मों को बुना है,
पर इनकी भाषा शायद, सब समझ पाते नहीं हैं,
पर मैंने इनकी खामोशियों को भी सुना है।
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(2)
समुद्र सी है ये दुनिया और एक बूंद से हम हैं,
सब कुछ है पास में फिर भी अपूर्ण से हम हैं;
मन में है अनगिनत ख्याल और असीमित ख्वाहिशें,
पर व्यक्त करने में ताला से बंद संदूक से हम है।
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(3)
कुछ मन्नतें अधूरी ही रहें, तो ही अच्छा है,
कुछ ख़्वाहिशें लब न कहें, तो ही अच्छा है,
पूरी होने पर शायद वज़ह न रहे जुड़ने की,
कुछ मंज़िलें न ही मिलें, तो ही अच्छा है।
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(4)
मेरे अल्फ़ाज़ों के मफ़्हूम को जो समझ गए तुम,
तो शायद मुझसे दूर जाना तुम्हारा मुश्किल होगा,
और दिल लगाने की हमें है अब कोई चाहत नहीं,
इसलिए साथ आगे बढ़ पाना हमारा नमुमकिन होगा।
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(5)
तेरी नज़रों के रम्ज़ से, वाकिफ़ हैं हम भी,
पर वो लफ़्ज़ तेरे लबों से, सुनने की ख़्वाहिश है मुझे,
तेरे दिल के घरौंदे में, कोई मुसाफिर नहीं,
ज़िन्दगी भर के लिए, साँझेदार बनने की ख़्वाहिश है मुझे।
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(6
किसी की ज़िन्दगी में मात्र, 
हिस्सा नहीं, बहुत खास बनना है;
उसकी ज़िन्दगी में सिर्फ़ कोई,
किस्सा नहीं, उपन्यास बनना है।
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(7)
अधूरी ख़्वाहिशें ही अक्सर याद रह जाती हैं,
पूरी ख़्वाहिशें ज़हन में जगह ही कहाँ पाती हैं
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(8)
किसी के मन की गहराई भी तब तुम नाप सकते हो,
अगर उसके नैनों में सच्चे मन से तुम झाँक सकते हो।
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----(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")---

*(मफ़्हूम =तात्पर्य/ आशय, रम्ज़=इशारे, ज़हन=मन)

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