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दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने कुछ यूँ बताया पराली की समस्या का जड़ से समाधान

दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने कुछ यूँ बताया पराली की समस्या का जड़ से समाधान

नई दिल्ली। दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने आज केंद्रीय पर्यावरण मंत्री की अध्यक्षता में एनसीआर के राज्यों के साथ आयोजित संयुक्त बैठक में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने को लेकर कई अहम सुझाव दिए। उन्होंने सभी राज्यों से युद्ध स्तर पर बायो डि-कंपोजर का छिड़काव करने की अपील करते हुए कहा कि राज्य सरकारें बायो डि-कंपोजर का घोल बनाने से लेकर खेतों में छिड़काव तक की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेंगी, तभी पराली की समस्या का जड़ से समाधान संभव है। हमें पता चला है कि कुछ राज्य किसानों को केवल कैप्सूल बांटने की योजना बना रहे हैं, इससे यह काम जमीन पर नहीं उतर पाएगा। अगर दिल्ली सरकार घोल तैयार करने से लेकर छिड़काव करने तक की जिम्मेदारी अपने हाथ में नहीं लेती, तो दिल्ली में पराली की समस्या का समाधान नहीं हो पाता। उन्होंने कहा कि राज्य सरकारें अभी पराली के नाम पर जितना पैसा खर्च कर रही हैं, उसके एक चौथाई पैसे में ही बायो डि-कंपोजर का छिड़काव कर सकती है। अगर सभी सरकारें समय रहते कदम नहीं उठाती हैं, तो इस बार भी दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत को पराली की समस्या झेलनी पड़ेगी।

 

दिल्ली में प्रदूषण स्तर बढ़ने का सबसे ज्यादा कारण बाहर से आना वाला प्रदूषण है

 

दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में वायु प्रदूषण के संबंध दिल्ली-एनसीआर के राज्यों के साथ आज ऑनलाइन आयोजित संयुक्त बैठक में हिस्सा लिया। इस बैठक में एयर क्वालिटी मैनेजमेंट कमीशन के चेयरमैन एम एम कुट्टी, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा व राजस्थान के पर्यावरण मंत्री और पंजाब के मुख्य सचिव भी शामिल हुए। बैठक में पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री के समक्ष दिल्ली सरकार की तरफ से कई सुझाव दिए। सिविल लाइन में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दिए सुझावों की जानकारी देते हुए पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने कहा कि संयुक्त बैठक में सभी राज्यों और केंद्र सरकार ने अपनी बात रखी। बैठक में मुख्य तौर पर जाड़े के समय में बढ़ने वाले प्रदूषण स्तर को लेकर के चर्चा हुई। चूंकि प्रदूषण का दिल्ली केंद्र बिंदु है। उत्तर भारत के इलाकों में जितनी गतिविधियां होती हैं, भौगोलिक बनावट के कारण उन सबका सबसे ज्यादा प्रभाव दिल्ली पर पड़ता है। दिल्ली के अंदर जो प्रदूषण होता है, उसमें दिल्ली में पैदा होने वाले प्रदूषण की भी हिस्सेदारी होती है, लेकिन उससे ज्यादा दिल्ली में प्रदूषण स्तर बढ़ने का कारण बाहर का प्रदूषण है।

 

हरियाणा और पंजाब में पराली जलने की घटनाएं बढ़ते ही दिल्ली में पीएम-10 और पीएम-2.5 का स्तर बढ़ जाता है

 

पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने कहा कि हम पिछले पिछले एक हफ्ते से वायु गुणवत्ता की निगरानी कर रहे हैं। अक्टूबर का महीना आने वाला है। हमने इस महीने (सितंबर) कुछ दिनों के पीएम-10 और पीएम-2.5 के स्टेटस पर करीब से नजर रखा। जिसमें पाया कि 18 सितंबर को पीएम-10 का स्टेटस 67 था, जबकि पीएम-2.5 27 था। इसी तरह, 19 सितंबर को पीएम-10 85 व पीएम-2.5 35, 20 सितंबर को पीएम-10 78 व पीएम-2.5 31, 21 सितंबर को पीएम-10 81 व पीएम-2.5 31 और 22 सितंबर को पीएम-10 64 व पीएम-2.5 27 था। पिछले साल मैं पीएम-10 और पीएम-2.5 के इंडेक्स को लगातार वॉर रूम से मानिटर कर रहा था कि किस तरह से उसका ग्राफ बढ़ रहा है। उसमें हमने बहुत सारी गतिविधियों के साथ-साथ एक चीज को मॉनिटर किया कि पड़ोसी राज्य पंजाब और हरियाणा राज्य में पराली जलने की घटनाएं जैसे ही बढ़नी शुरू होती हैं, दिल्ली के पीएम-10 और पीएम-2.5 का ग्राफ भी बढ़ता जाता है। इसलिए आज की बैठक में मैंने सभी राज्य सरकारों और केंद्र सरकार से सबसे पहले यही अपील की है कि पराली की समस्या को जड़ से समाधान के लिए इमरजेंसी कदम के तौर पर सभी सरकारें बायो डि-कंपोजर का युद्ध स्तर पर छिड़काव करने की तैयारी करें।

 

दिल्ली में बायो डि-कंपोजर कैप्सूल खरीदने से लेकर छिड़काव तक करीब 1000 रुपए प्रति एकड़ तक लागत आ रही है

 

उन्होंने कहा कि बैठक में पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश समेत कई सरकारों ने बताया कि वे बायो डि-कंपोजर के उपयोग का निर्णय ले रहे हैं, लेकिन कई जगह से हमें सूचना मिली है कि वे कैप्सूल खरीद कर किसानों में बांटने की योजना बना रहे हैं। मैं सभी राज्यों से अनुरोध करना चाहता हूं कि किसानों को केवल कैप्सूल बांटने से यह काम जमीन पर नहीं उतर पाएगा। अगर दिल्ली सरकार यह जिम्मेदारी अपने हाथ में नहीं लेती, तो दिल्ली के अंदर भी यह काम नहीं हो पाता। दिल्ली के अंदर तीन जिलों में खेती होती है, वहां कृषि विभाग के अधिकारी काम करते हैं। हमने हर जिले के कृषि अधिकारी की टीम को जिम्मेदारी दी है। हम कैप्सूल लेकर खुद घोल तैयार करा रहे हैं। साथ ही, घोल को किसानों के खेत में छिड़काव करने तक की सारी जिम्मेदारी सरकार अपने हाथ में ले रही है। अगर सिर्फ कैप्सूल या घोल बांट दिया जाएगा, तो उससे जिस जिम्मेदारी के साथ इमरजेंसी स्तर पर काम करने की जरूरत है, वह काम जमीन पर लागू नहीं हो पाएगा। इसलिए सरकारों को आगे बढ़ कर इस काम को करने की जरूरत है। लागत की जहां तक बात है, तो दिल्ली में कैप्सूल खरीदने से लेकर छिड़काव तक लगभग 1000 रुपए प्रति एकड़ तक लागत आ रही है। घोल को बनाने से लेकर खेत में छिड़काव करने तक यह सरकार की लागत है।

 

सरकारें पराली के नाम पर अभी जितना पैसा खर्च कर रही है, उसके एक चौथाई पैसे में ही बायो डि-कंपोजर का छिड़काव कर सकती हैं

 

पर्यावरण मंत्री ने कहा कि बैठक में मौजूद हरियाणा के मुख्यमंत्री एवं पर्यावरण ने बताया कि उन्होंने पराली न जलाने वाले लोगों के लिए 1000 रुपए प्रोत्साहन राशि (इंसेंटिव) घोषित किया है। इसके अलावा, हम मनीशनरी खरीदने के लिए 200 करोड़ रुपए अलग से सब्सिडी दे रहे हैं। मुझे लगता है कि इतना पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं है। वह जो 1000 रुपए इंसेंटिव घोषित किए हैं, केवल उतना ही लागू कर दिया जाए और घोल तैयार कर पराली पर छिड़काव कर दिया जाए, तो इस पराली की समस्या से हरियाणा मुक्त हो सकता है, पंजाब मुक्त हो सकता है। पराली के नाम पर अभी सरकारें जितना पैसा खर्च कर रही हैं, उसके एक चौथाई पैसे में ही बायो डि-कंपोजर के घोल तैयार कर सरकार कृषि विभाग के अधिकारियों के माध्यम से हर खेत तक छिड़काव कर सकती है। मुझे लगता है कि अगर यह काम नहीं किया जाता है, तो इस बार भी दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत को कहीं न कहीं पराली की समस्या को झेलना पड़ेगा। इसलिए आज मैंने बैठक में सभी लोगों से निवेदन किया कि इसको इमरजेंसी मॉडल के तौर पर लिया जाए। अभी समय भी है कि सरकारें इस पर त्वरित रूप से काम करें।

 

एनसीआर से दिल्ली आने वाले सभी पब्लिक ट्रांसपोर्ट को भी सीएनजी पर किया जाए, ताकि दिल्ली में वाहनों के प्रदूषण में कमी आ सके

 

पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने कहा कि दिल्ली के अंदर पब्लिक ट्रांसपोर्ट सीएनजी पर चलता है। हमने बैठक में केंद्रीय मंत्री से निवेदन किया है कि एनसीआर के अंदर सभी पब्लिक ट्रांसपोर्ट को सीएनजी पर किया जाए, क्योंकि दिल्ली में पब्लिक ट्रांसपोर्ट सीएनजी पर चलेगा और बाहर से आने वाला सारा पब्लिक ट्रांसपोर्ट अगर डीजल पर रहेगा, तो दिल्ली का सारा प्रयास प्रभावित हो रहा है। हमने मांग की है कि एनसीआर के अंदर भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट को सीएनजी पर ट्रांसफर किया जाए, ताकि उससे पैदा होने वाले प्रदूषण को रोका जा सके। हमने बताया कि दिल्ली के अंदर प्रदूषित ईंधन से चलने वाली सभी तरह की औद्योगिक इकाइयों को हमने 100 फीसद पीएनजी में बदल दिया है। अन्य राज्यों को भी प्रदूषित ईंधन पर चलने वाली औद्योगिक इकायों को पीएनजी में बदलने का लक्ष्य दिया गया है, लेकिन वहां पर गहन निगरानी और इकाइयों के पीएनजी पर ट्रांसफर करने का काम ढीला चल रहा है। हमने निवेदन किया है कि इसको त्वरित गति से किया जाए, ताकि औद्योगिक इकाइयों से होने वाले प्रदूषण को रोका जा सके।

 

पड़ोसी राज्यों में चल रहे थर्मल पावर प्लांट को नई तकनीक में बदला जाए या बंद किया जाए

 

उन्होंने कहा कि दिल्ली के अंदर कोयले से चलने वाले दो थर्मल पावर प्लांट से चलते थे, जिसे दिल्ली ने बंद कर दिया है। वहीं, अभी भी दिल्ली के पड़ोसी राज्यों में न तो नई तकनीक लगाई गई है और न तो उसे बंद किया जा रहा है। वे हर साल छूट लेते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। उन पर जुर्माना लगाया जाता है और आगे बढ़ जाते हैं। जुर्माना लगाना इसका समाधान नहीं है। इन्हें या तो नई टेक्नोलॉजी में बदला किया जाए या फिर बंद किया जाए। क्योंकि उसकी जहरीली गैस वायु प्रदूषण के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक मानी जाती है। साथ ही ईट-भट्टों की बात भी हमने उठाई। हरियाणा का कहना है कि वो जिकजैक तकनीक पर काम कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भी काम हो रहा है, लेकिन अभी तक बहुत ही कम यूनिट जिकजैक तकनीक पर आई है। इस पर अगर कार्रवाई नहीं होती है, तो ठंड के मौसम में उसका प्रदूषण भी दिल्ली और उत्तर भारत के लोगों को झेलना पड़ेगा। हमने जेनसेट बंद रखने का भी प्रस्ताव रखा है। दिल्ली में 24 घंटे बिजली उपलब्ध होने के कारण की जेनसेट की उपयोगिता कम हो गई है। जेनसेट में एक नई तकनीक आई है, जिसे लगाने से उसमें प्रदूषण उत्सर्जन की क्षमता कम हो जाती है। पिछले साल जब सीवियर स्थिति में जा रहे थे और जेनसेट बंद करने की गाइड लाइट आई, तब भी हरियाणा में कई सारे जगहों पर इसलिए जेनसेट चलाने की छूट ली गई कि उन कालोनियों में बिजली नहीं है। हमने वहां पर इमरजेंसी व्यवस्था करने का अनुरोध किया है और सीवियर स्थिति में जेनसेट के संचालन पर रोक लगाने की मांग की है।

 

पड़ोसी राज्यों से दिल्ली से सटे इलाकों में हॉटस्पॉट चिंहित कर कार्रवाई के लिए स्पेशल टास्क फोर्स गठित करने की अपील

 

पर्यावरण मंत्री ने कहा कि दिल्ली ने पटाखों पर प्रतिबंध लगाया है, लेकिन अगर पड़ोसी राज्यों में पटाखे बेचने और जलाने की छूट दी जाती है, तो प्रतिबंध के बावजूद दिल्ली में लोग वहां से पटाखे खरीदेंगे। इसलिए हमने सभी राज्यों में पटाखों की बिक्र पर पहले से ही प्रतिबंध लगाने की मांग की है। जिससे कि पटाखों की वजह से दिवाली पर होने वाले प्रदूषण पर रोक लगाई जा सके। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के सभी मुख्य अधिकारी और मंत्री लखनऊ में बैठते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा धूल और औद्योगिक प्रदूषण दिल्ली से सटे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाके में होता है। इसी तरह, हरियाणा में अधिकारियों का पूरा अमला चंडीगढ़ में बैठता है, लेकिन प्रदूषण के सभी हॉटस्पॉट दिल्ली से सटे इलाकों में है। हमने प्रस्ताव रखा है कि वहां की सरकारें इन इलाकों के लिए एक टास्क फोर्स गठित करें, जो जमीनी स्तर कार्रवाई और निरीक्षण कर सकें और इस पर केंद्रीय होकर काम कर सकें। साथ ही, जिस तरह दिल्ली ने अपना हॉटस्पॉट चिंहित किया है और हम वहां पर टीम लगाकर काम करते हैं। उसी तरह, पड़ोसी राज्यों में भी इन जगहों पर हॉटस्पॉट चिंहित किया जाए और उसके लिए स्पेशल टास्क फोर्स गठित कर काम शुरू किया जाए। मुझे लगता है कि इससे एनसीआर में दिल्ली के चारों चल रहे निर्माण कार्य स्थलों पर होने वाले धूल के प्रदूषण को नियंत्रित करने मे मदद मिल पाएगी।

 

दिल्ली से सटे पड़ोसी राज्यों के शहरों में भी रेड लाइट ऑन, गाड़ी ऑफ अभियान चलाया जाए, तो प्रदूषण कम करने में मदद मिलेगी

 

पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने आगे कहा कि हमने बैठक में इलेक्ट्रिक वाहन को लेकर भी प्रस्ताव रखा। हमने मांग की है कि इलेक्ट्रिक वाहन पॉलिसी को पड़ोसी राज्य भी अपनाएं। क्योंकि अगर अगर आगे बढ़ना है, तो सभी लोगों को साथ मिल कर आगे बढ़ना पड़ेगा। एयर क्वालिटी मैनेजमेंट कमीशन ने भी इसे अपनाने के लिए सभी राज्यों को लिखा है। दिल्ली ने जो किया है, उसका रिस्पॉस काफी साकारात्मक दिख रहा है। हमने दिल्ली में ट्री-ट्रांसप्लांटेशन पॉलिसी भी अपनाया है, इसे भी हमने बैठक में रखा है कि अगर सभी राज्य इस दिशा बढ़ें, तो उसका भी हमें फायदा होगा। वहीं, हमने पिछले साल वाहनों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए रेड लाइट ऑन, गाड़ी ऑफ अभियान चलाया था। मुझे लगता है कि अगर दिल्ली से सटे पड़ोसी राज्यों के शहरों में भी यह अभियान चलाया जाता है, तो इससे भी हमें वाहनों का प्रदूषण कम करने में मदद मिलेगी। दिल्ली की तरफ से हमने यह मुख्य बिंदु बैठक में उठाए। मुझे उम्मीद है कि केंद्र सरकार और एयर क्वालिटी मैनेजमेंट कमीशन अगर समयबद्ध तरीके से इस पर कार्रवाई करता है और राज्य सरकारों की तरफ से भी ठोस कार्रवाई होती है, तो हम लोग इस बार प्रदूषण को कम करने में सफल होंगे।


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