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आइये विचार करें देश के भविष्य निर्माताओं में संस्कार डालते विज्ञापन जगत की

आइये विचार करें देश के भविष्य निर्माताओं में संस्कार डालते विज्ञापन जगत की

संस्कार , जो किसी भी सभ्यता , किसी भी संस्कृति की पहचान होते हैं | क्या आपने कभी सोचा है कि इन संस्कारों में पीढ़ी दर पीढ़ी परिवर्तन आने के भला क्या कारण हो सकते हैं | आखिर क्यों आजकल बच्चों या  युवा पीढ़ी में वैचारिक परिवर्तन देखा जा रहा है l जबकि सभी माँ-बाप यही चाहते हैं कि उनका व्यवहार अपने बड़ों के प्रति कैसा भी क्यों ना हो, लेकिन उनका अपना बच्चा बिलकुल श्रवण कुमार जैसा होना चाहिए | आइये विचार करें देश के भविष्य निर्माताओं में संस्कार डालते विज्ञापन जगत की .......... जी हाँ ! चौंकिए मत l

पहले भले ही हम अपने बच्चों को संस्कार सीखने के लिए गुरुकुल भेजा करते थे , या फिर संयुक्त परिवारों में उन्हें अपने बड़ों से जाने अनजाने बहुत कुछ स्वतः ही सीखने को मिल जाया करता था, लेकिन अब तो धीरे-धीरे पूरी दुनिया ही एकल परिवारों और डिब्बे जैसे घरों में सिमटने लगी है |

यकीन मानिए आज के बच्चे टीवी के सामने बैठकर जो कुछ देख सुन रहे हैं , कहीं ना कहीं वही आधारभूत कारण है उनके मूल्यों एवं संस्कारों  में आ रहे परिवर्तन का l क्या आपने गौर किया है कि घर की चारदीवारी में मोबाइल हाथ में लिए या फिर लैपटॉप या टीवी के सामने आँखे गडाए आखिर वे  देख क्या रहे  है ? वेब श्रृंखलाओं की बात तो छोड़ ही दीजिये सामान्य सा विज्ञापन ही देख लीजिये |ये विज्ञापन भी सकारात्मकता या नकारात्मकता को फैलाने के इन दिनों सशक्त माध्यम बनते जा रहे हैं l

 एक ओर विज्ञापन में जहां बच्चों में कपडे गंदे होने पर भी बड़ों की सहायता के लिए प्रेरित करते हुए दिखाया जाता है उन्हें हमारी भारतीय संस्कृति के अनुसार मानवीय मूल्यों को ध्यान में रखते हुए सिखाने का प्रयत्न किया जाता है  कि आप कर्म में विशवास रखो , परोपकार जैसी भावना मन में लाओ चाहे कपडे गंदे क्यों ना हो जाए क्योंकि उन्हें बदला या धोया जा सकता है l इन छोटी छोटी परेशानियों से डरकर पीछे मत हटो |

कहीं किसी विज्ञापन में कीचड़ में फंसी एम्बुलेंस को लोग केवल इस डर  से नहीं निकालते कि कहीं कपडे गंदे ना हो जाएँ और तभी नारी शक्ति आगे आकर सबकी प्रेरणा बनती हैं l एक विज्ञापन जो मुझे सर्वाधिक प्रिय रहा वह  था ...बारिश में पेड़ गिरने से रास्ता जाम है और सब केवल हॉर्न बजा रहे हैं ....तभी एक बच्चा अकेला ही उस पेड़ को हटाने का प्रयास करता है l उसका ये छोटा प्रयास सभी को शर्मिन्दा करता है और सभी गाड़ियों से बाहर निकलकर पेड़ को रास्ते से हटा देते हैं l

किस तरह एक छोटे से किन्तु लगातार टीवी आदि पर चलने वाले विज्ञापन के माध्यम से बच्चे सीख जाते थे कि एकता में ही बल होता है किन्तु दुर्भाग्यवश आज नई  पीढ़ी की युवती अच्छी माँ की क्या परिभाषा सीख रही हैं .... यही ना कि बच्चों को दादी की गोद से ज्यादा आराम गाडी की सीट में बांधकर बैठाने से मिलेगा , हर पल हर छोटी छोटी बात में बच्चे के आगे पीछे रहकर या बड़े ब्रांड के कपडे पहनाकर ही वह अच्छी माँ बन सकती है इसके लिए यदि लोग उसे बुरा कहते हैं , बड़ों की भावनाएं आहत होती हैं तो हो जाएँ l उसे फिक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है l

बुरा तो तब लगता है जब विज्ञापन के नाम पर बच्चों में कुछ ना करने की और  बड़ों को उनके ही हाल पर छोड़ देने की बात करना भी कूलबनने का पर्याय दिखाया जाता है | क्यों आज छोटे बच्चों के कुछ नए विज्ञापनों से दादी नानी की भूमिका ही समाप्त हुई जा रही है ? हद तो तब हो जाती है जब आप प्राइवेसीके  नाम पर कंक्रीट के ऊंचे मकान यह कहकर बेचना शुरू कर देते हैं कि पड़ोसी या घर के बड़ों को हमारी बातें क्यों पता चले ? जो चाहे करें इधर अपनी..... केवल अपनी... एक अलग दुनिया बनाकर जहां आपकी बात कोई नहीं सुन सकेगा l यहाँ आप अपनी मर्ज़ी से जो चाहे करें, जैसे चाहे रहें .........पर  क्यों भूल जाते हैं कि हमारी सभ्यता और संस्कृति वसुधैव कुटुम्बकमकी बात करती है , पडोसी धर्म को सर्वश्रेष्ठ बताती है l

क्या नहीं जानते हम कि समय पड़ने पर रिश्तेदारों के आने से पहले पडोसी ही होते हैं जो हमारे काम आते हैं l फिर किस तरह की प्राइवेसी की बात इन विज्ञापनों में की जा रही है ? क्यों हम मिलना जुलना छोड़ एक ऐसी दुनिया में जीना चाहते हैं जहां किसी को किसी से कोई मतलब नहीं l अपने जिस लाडले के लिए आप महंगे कपडे , महंगे उत्पाद और महँगी शिक्षा के पीछे दौड़ते रहे , वही एक दिन अपनी प्राइवेसीके चलते आपसे कितनी सहजता से अलग होकर अपना एक अलग घर बसाएगा तब क्या करेंगे आप! अपनी चोकलेट खाने में मस्त होकर बड़ों की हर बात अनसुनी करना शुरू कर देगा तब क्या कहेंगे आप!

हम किसी विज्ञापन या मीडिया माध्यमों के खिलाफ नहीं हैंकिन्तु आज आवश्यकता है ध्यान से परखने की कि हम बच्चों तक किस तरह की सीख , कैसे संस्कार पहुँचा रहे हैं l यह हमारा नैतिक कर्तव्य भी है l यदि बदलते संस्कारों के लिए हम आज की युवा पीढ़ी को ही दोषी ठहराएंगे तो यह पूरी तरह गलत होगा l बच्चे जो देख रहे हैं ठीक वैसा ही कर भी रहे हैं l उनका बाल मन आज भी सहज और सरल है l

एक शिक्षिक, समाजसेवक या मांता पिता  किसी भी रूप में सोचकर देखिये कि क्या विज्ञापनों का एक मात्र ध्येय पैसा कमाना भर है ? क्या अपने राष्ट्र के प्रति , समाज के प्रति , भविष्य निर्माताओं के प्रति उनका कोई कर्त्तव्य नहीं ? केवल वही क्यों? क्या हमारा यह कर्त्तव्य नहीं कि आये दिन हो रहे इन परिवर्तनों पर ध्यान दें और विचार करें l आवाज़ उठायें | सोचें कि हमारे बच्चों के लिए क्या सही है और क्या गलत है ? क्या इसके लिए भी हमें महंगे विज्ञापनों का सहारा लेना होगा ? नहीं l

अपने बच्चों को अच्छी परवरिश देने के लिए हमें इन विज्ञापनों और उनके द्वारा बेचे जा रहे उत्पादों के पीछे भागने की बजाए बच्चों की अच्छी शिक्षा और अच्छे संस्कारों पर ध्यान देना चाहिए , मानवीय मूल्यों को बनाये रखने की शिक्षा देनी चाहिए l नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी आने वाली पीढ़ियों की सोच भी कोमल भावों को त्याग आगे बढ़ने की तकनीकी दौड़ में यांत्रिक हो जायेगीl उस समय आप कहीं यही ना सोचते रह जाएँ ..... अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत

डॉ० पूजा कौशिक

(यह लेखिका के निजी विचार हैं)


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