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मां चंद्रघंटा की कथा

मां चंद्रघंटा की कथा

नवरात्रि के नौ दिनों में तीसरा दिन माता चंद्रघंटा का है। चंद्रघंटा देवी की पूजा अर्चना करने वाले भक्तों को शक्ति तथा ओज की प्राप्ति होती है। चंद्रघंटा देवी का अवतार मुख्य रूप से दानवों तथा दैत्यों का विनाश करने के लिए हुआ था।

माता चंद्रघंटा असुरों के विनाश हेतु नवरात्रि के तीसरे रूप में अवतरित हुई थी। दानवों को मारने वाली यह देवी हैं। देवी चंद्रघंटा ने महिषासुर का वध किया था। असुरों की शक्ति को क्षीण करके, देवताओं का हक दिलाने वाली देवी चंद्रघंटा शक्ति का रूप हैं। 

शास्त्रों के ज्ञान से परिपूर्ण, मेधा शक्ति धारण करने वाली देवी चंद्रघंटा संपूर्ण जगत की पीड़ा को मिटाने वाली हैं। मुख मंद मुस्कान से कान्तिवान, निर्मल, अलौकिक तथा चंद्रमा के बिम्ब प्रतीक सा उज्ज्वल है। ऐसा दिव्य स्वरूप देखकर भी महिषासुर ने देवी के अलौकिक स्वरूप पर प्रहार किया। उनके प्रेम, स्नेह का रूप तब भयंकर ज्वालामुखी की भांति लाल होने लगा, यह क्षण आश्चर्य से भरा हुआ था। उनके इस रूप का दर्शन करते ही महिषासुर भय से कांप उठा। उन्हें देखते ही दानव महिषासुर के प्राण तुरंत निकल गये।

देवी चंद्रघंटा एक अद्भुत शक्ति का रूप हैं, देवी चंद्रघंटा के क्रोध में आ जाने पर तत्काल ही असंख्य कुलों का सर्वनाश हो जाता है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार महिषासुर के राक्षस कुल का अंत देवी चंद्रघंटा ने क्षण भर में कर डाला। 

मां चंद्रघंटा पूजा का मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।