होम > अन्य

अनंत चतुर्दशी की पौराणिक कथा

अनंत चतुर्दशी की पौराणिक कथा

भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि में अनंत चतुर्दशी का व्रत उपवास श्रद्वा और भक्ति भाव के साथ रखा जाता है। इस दिन पुरोहितों द्वारा भगवान श्रीहरि विष्णु की कथा सुनने के बाद अनंत धागा को प्रणाम कर धारण करते है।

 

पुरोहित ने इस कथा में बताये है कि भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों को जुए में अपनी राज्य हार जाने के पश्चात बारह वर्ष को मिले बनवास के कष्ट से छुटकारा पाने के लिए अनंत व्रत करने को कहे थे, तथा इस व्रत की महत्ता बताते हुए कहा कि प्राचीन काल में सुमंत नामक ऋषि की पुत्री सुशीला ने शुरुवात कि थी

 

जिनका विवाह कौडिंय ऋषि के साथ हुआ था। वहीं सर्वप्रथम नदी किनारे अनंत चतुर्दशी को अनंत भगवान की पूजा आराधना कि। जिसके उपरांत उसे सभी के धन्य धान्य सुख प्राप्त हुआ । वैसे तो यह व्रत पूर्ण निष्ठा के साथ चौदह वर्ष धारण करने चाहिए। अनंत डोरे में इसी कारण चौदह गांठ होता है, जिसे व्रती पुरुष दाहिने और महिला बाएं हाथ धारण करती है।कथा सुनने के अंत में भक्तों ने क्षीर समंदर का मंथन की आराधना करते है। जो भी भक्त अनंत व्रत का उपवास करता है, निश्चित ही उस पर श्रीहरि भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है।

 

अनंतचतुर्दशी में अनंत सूत्र बांधने की परंपरा है। इसके पीछे मान्यता है कि,अनंत सूत्र बांधने से प्राणी की अनंत काल तक भगवान नारायण रक्षा करते हैं।