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कूष्मांडा मां की कथा

कूष्मांडा मां की कथा

कूष्मांडा मां को अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में जपमाला है। कूष्मांडा मां सिंह की सवारी करती हैं।

शास्त्रोक्त में उल्लेख है की जब सृष्टि का अस्तित्व भी नहीं था तब चारो तरफ सिर्फ अंधकार ही अंधकार था, उस समय माँ कुष्मांडा ने अपने मंद हास्य से सृष्टि की उत्पत्ति की थी। कुष्मांडा माँ के पास इतनी शक्ति है की वो सूरज के घेरे में भी रह सकती है, क्योकि उनके पास ऐसी शक्ति है जो अत्यंत गरमी को भी सहन करती सकती है । इसलिए माँ कुष्मांडा की पूजा से जीवन में सभी प्रकार की शक्ति और ऊर्जा प्राप्त होती है। माँ कुष्मांडा अष्टभुजावाली है, माँ सिंह पर सवारी करती है, माँ कुष्मांडा के मस्तक पर रत्नजड़ित मुकुट सुशोभित है, जिसके कारण उनका स्वरुप अत्यंत उज्जवल लगता है।

मां कूष्मांडा का मंत्र
या देवी सर्वभूतेषु मां कूष्मांडा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।