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स्वस्तिक का महत्व

स्वस्तिक का महत्व

आइये जानते स्वस्तिक का महत्व स्वस्तिक अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिह्न बना कर उसका पूजन किया जाता है। 

स्वास्तिक शब्द में 'सु' का अर्थ शुभ होता है और 'अस्ति' का मतलब होना है, हिंदू धर्म के रीति रिवाजों में किसी भी शुभ काम को करने के पहले भगवान गणेश और स्वास्तिक का निशान बनाया जाता  है।

स्वास्तिक के प्रयोग से धनवृद्धि, गृहशांति, रोग निवारण, वास्तुदोष निवारण, भौतिक कामनाओं की पूर्ति, तनाव, अनिद्रा व चिन्ता से मुक्ति मिलती है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले सर्वप्रथम स्वास्तिक बना कर ही किया किया जाता है। ज्योतिष में इस मांगलिक चिह्न को प्रतिष्ठा, मान-सम्मान, सफलता व उन्नति का प्रतीक माना गया है।

वास्तु के अनुसार यह बताता है कि घर के प्रवेश द्वार पर स्वास्तिक बनाने से नकारात्मकता से छुटकारा मिलता है। सकारात्मक वाइब्स को आकर्षित स्वस्तिक को उत्तर-पूर्व दिशा में बनाना से आता है।

स्वास्तिक प्लस का साइन बनाते हैं और उसके बाद स्वास्तिक की अन्य भुजाएं बनाते हैं। मगर आपको जानकारी होनी चाहिए , इस तरह बनाए गए स्वास्तिक को शुभ नहीं माना जाता है। स्वास्तिक का हमेशा पहले दाएं का भाग बनाएं और फिर बाएं का भाग बना दें। इस तरह बने स्वास्तिक को ही शुभ माना जाता है।
ऐसी भी मान्यता है की उल्टी दिशा में बनाए गए स्वास्तिक का घर और परिवार पर विपरीत प्रभाव होता है। हमें पता भी नहीं चलता और घर का महौल बिगड़ने लगता है। कलह बढ़ने लगती है। दरअसल, उल्टा स्वास्तिक ऊर्जा के फ्लो को उल्टी दिशा में प्रवाहित करने लगता है, ऐसी मान्यता है।