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चीन को करना पड़ सकता है बढ़ते अलगाव का सामना

चीन को करना पड़ सकता है बढ़ते अलगाव का सामना

गौतम अडानी का मानना है की चीन को बढ़ते अलगाव का सामना करना पड़ सकता है। चीन  जिसे कभी वैश्वीकरण के अग्रणी चैंपियन के रूप में देखा जाता था उसे अपनी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के अपने रास्ते में गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। इतना ही नहीं बल्कि व्यापार समूह के अनुसार, अन्य रास्ते तलाशने वाले वैश्विक निवेशकों के साथ अलगाव का सामना भी करना पड़ सकता है।

सिंगापुर में आयोजित 20वें फोर्ब्स ग्लोबल सीईओ सम्मेलन में मुख्य भाषण के दौरान अडानी ने बोला की, बढ़ते राष्ट्रवाद, आपूर्ति श्रृंखला जोखिम शमन और प्रौद्योगिकी प्रतिबंधों को उन चुनौतियों के बीच सूचीबद्ध किया जो दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती हैं। तकरीबन 30 मिनट  के अपने संबोधन में अडानी ने भारत की आर्थिक संभावनाओं के बारे में भी बताया। भारत के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि इसकी अर्थव्यवस्था परिपूर्ण से बहुत दूर है लेकिन देश के लोकतंत्र का सार इसकी अपूर्णता में निहित है।

अदानी समूह के अध्यक्ष ने चीन के आवास और ऋण जोखिम विज्ञापन का हवाला देते हुए उसकी तुलना 1990 के खोए हुए दशक में जापान की अर्थव्यवस्था के साथ की थी। उन्होंने कहा, मुझे आशा है कि चीन जिसे वैश्वीकरण के अग्रणी चैंपियन के रूप में देखा गया था वह तेजी से अलग-थलग महसूस करेगा। बढ़ते राष्ट्रवाद, आपूर्ति श्रृंखला जोखिम शमन, और प्रौद्योगिकी प्रतिबंधों का प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा की उन्हें उम्मीद है कि ये सभी अर्थव्यवस्थाएं समय के साथ फिर से समायोजित हो जाएंगी। लेकिन उछाल-वापसी का घर्षण इस बार चीन के लिए कहीं अधिक कठिन लग रहा है।

गौतम अडानी ने कहा, भारत की खामियों के रूप में कई लोग देखते हैं कि भारत एक संपन्न और शोर-शराबा लोकतंत्र है। लेकिन केवल स्वतंत्र ही शोर कर सकते हैं अपनी खामियों को प्रकट करने के लिए। इसे अधिक प्रबंधित करना भारत की विविधता को व्यक्त करने की अद्वितीय क्षमता को नष्ट करना होगा। अडानी ने बताया कि भारत अभी दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है और 2030 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की क्षमता रखता है।