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ग्लोबल वार्मिंग के चलते बढ़ रहा है खतरा, तापमान लगभग दो डिग्री सेल्सियस बढ़ा

ग्लोबल वार्मिंग के चलते बढ़ रहा है खतरा, तापमान लगभग दो डिग्री सेल्सियस बढ़ा

नई दिल्ली। ग्लोबल वार्मिंग की समस्या बढ़ती जा रही है, हम लोग अपनी निजी जीवन में इतने व्यस्त हैं कि इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता। आर्कटिक महासागर 20वीं सदी की शुरुआत से ही गर्म होना शुरू हो गया है। यानी अभी तक अध्ययन जो बताते रहे हैं उससे भी एक दशक पूर्व ही आर्कटिक महासागर के गर्म होने की शुरुआत हो चुकी थी। यह अध्ययन साइंस एडवांसेज नामक जर्नल में प्रकाशित किया गया है।

 हमारी धरती को वर्तमान में कई संकटों का सामना करना पड़ रहा है। इसी में से एक है ग्लोबल वार्मिग। इसे रोकने के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन चिंता बनी हुई है। अब इस दिशा में किए गए एक नवीन अध्ययन में जो परिणाम सामने आए हैं वो इस चिंता को और बढ़ाने वाले हैं। 

इंटरनेशनल रिसर्चर की एक टीम ने आर्कटिक महासागर का द्वार कहे जाने वाले फ्रैम स्ट्रेट नामक क्षेत्र में अध्ययन किया जो ग्रीनलैंड और स्वालबार्ड के बीच स्थित है। समुद्री सूक्ष्मजीवों में पाए जाने वाले रासायनिक लक्षणों के जरिये शोधकर्ताओं ने पाया कि आर्कटिक महासागर पिछली शताब्दी की शुरुआत में तब तेजी से गर्म होना शुरू हो गया था जब अटलांटिक से गर्म और खारा पानी बह रहा था। इस घटना को अटलांटिसीकरण कहा जाता है। दो डिग्री सेल्सियस बढ़ गया तापमानशोधकर्ताओं के मुताबिक, 1900 के बाद से समुद्र का तापमान लगभग दो डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है, जबकि समुद्री बर्फ घटी है और लवणता बढ़ गई है। 

आर्कटिक के गर्म होने के कारणों में से एक वजह अटलांटिसीकरण है, लेकिन उपकरण डाटा जो इस प्रक्रिया को ट्रैक कर सकते हैं, जैसे कि उपग्रह, केवल 40 साल पीछे जाते हैं। वर्तमान में जैसे-जैसे आर्कटिक महासागर गर्म होता जा रहा है, वैसे-वैसे धु्रवीय क्षेत्र की बर्फ पिघलती जा रही है, जिसकी वजह से वैश्विक समुद्र का स्तर प्रभावित हो रहा है। जैसे-जैसे बर्फ पिघलती जा रही है, वैसे-वैसे समुद्र की सतह पर सूर्य के प्रकाश का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। 

इससे तापमान बढ़ता है। इस तरह यह पूरी प्रक्रिया तेजी से आर्कटिक की बर्फ के लिए नुकसानदेह है। कब शुरू हुआ बदलावबोलोग्ना में राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद के इंस्टीट्यूट आफ पोलर साइंसेज में कार्यरत और इस अध्ययन के सह-लेखक डा. टेसी टोमासो के मुताबिक, जब हम अपने 800 साल के काल को देखते हैं तो तापमान और लवणता पर हमारा डाटा काफी स्थिर दिखता है, लेकिन अचानक 20वीं शताब्दी के मोड़ पर आपको तापमान और लवणता में यह विशिष्ट परिवर्तन देखने को मिलता है।