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विरोध और अनुसरण

जो थक कर कभी ,
तुम हिम्मत हारने लगो,
याद करो उस बात को,
उन सारे हालात को,
जो ले आयें हैं, तुमको इस क्षण तक,
याद करो उस अट्हास को;

जब लोग हँसे थे ये कहकर कि
ये तुमसे न हो पायेगा,
ये लक्ष्य बहुत ही मुश्किल है,
तू न ये पाने के काबिल है,
कुछ और तू सोच, कुछ और तू कर,
ये लक्ष्य न तेरी मंज़िल है।

ये सुनकर तेरा जिस्म,
जब क्रोधवश था धधक गया,
ऐसा कहने वाला हर कोई,
तब तुझे शत्रुसम था लग गया,
याद कर उस अग्निक्षण को,
चल याद कर उसी शत्रुदल को;

जब तू हो निराश और टूट कर,
तिनके-तिनके सा था बिखर रहा,
सारी दुनिया से लड़कर तब,
जो तेरे साथ उस पल था खड़ा,
याद कर उस शुभचिंतक को,
तेरे प्रति उसके समर्पण को;

जब प्राण प्रतिज्ञा की थी तूने,
परम लक्ष्य की प्राप्ति की,
तब कहा था तूने अपने अंतर्मन से –
न रुकेगा तू, न झुकेगा तू,
न दुनिया की बातों से डिगेगा तू,
कभी तेजी तो कभी धीरे-धीरे ही,
पर सीधे लक्ष्य की ओर ही बढ़ेगा तू,
जो कहना है विद्रोहियों को,
अपनी लक्ष्य विजय से कहेगा तू।

तो फिर बटोर ले साहस तू, और
कर प्रस्थान अपने कर्तव्य पथ पर,
‘विजेता’ बनने के सिवा,
कोई विकल्प नहीं है,
ये मान कर बढ़ चल,
अपने लक्ष्य की ओर।

जैसे उस दिन तूने प्रतिकारवश,
ये दुष्कर प्रतिज्ञा ले डाली थी,
याद कर उसी काल खण्ड को,
अपने भीतर की विलक्षण प्रतिभा को।

निश्चय ही तू विजय होगा,
तेरा फिर से अभ्युदय होगा,
जो अब तक तेरा विरोध करे है,
तब वो ही तेरा अनुचर होगा।

☆☆☆☆☆☆

—(Copyright@भावना मौर्या “तरंगिणी”)—

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