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श्राद्ध और श्रद्धा

श्रद्धा में यत्न से माता पिता की सेवा की जाती है ,और श्राद्ध में उन्हें याद किया जाता है।यदि जीते जी उनके प्रति श्रद्धा नहीं तो मरने के बाद उनकी श्राद्ध का भी अधिकार नहीं।

श्राद्ध और श्रद्धा,

श्राद्ध भले ही मृत्यु के बाद किये जाते हों,मगर श्रद्धा जीते जी रखी जा सकती है। एक बात समझना आवश्यक है, कि जीते जी माता-पिता, दादा-दादी की पूजा का अभिप्राय क्या है ?

अपने माता-पिता और बुजुर्गों से अच्छा व्यवहार करना और समय-समय पर उनका दुःख-सुख पूछना ही उनको पूजना है। इस समयाभाव वाले युग में अपने बुजुर्गों को पूजना तो दूर उनका हाल-चाल पूछना भी छोड़ दिया है। वो इसीलिए बेहाल हैं कि बच्चे हमारा हाल तक नहीं पूछते हैं।

ऐसे में उनके साथ किया गया प्रेम व्यवहार भी किसी अनुष्ठान, किसी पूजा और किसी सत्कर्म से कम नहीं है। श्राद्ध इसलिए आवश्यक है कि वह दिवंगतों को तृप्त करता है ,और श्रद्धा इसलिए आवश्यक है क्योंकि वह जीवित लोगों को तृप्त करती है।

श्रद्धा में यत्न से माता पिता की सेवा की जाती है, और श्राद्ध में उन्हें याद किया जाता है । यदि जीते जी उनके प्रति श्रद्धा नहीं तो मरने के बाद उनकी श्राद्ध का भी अधिकार नहीं,।

पन्चाग्न्यो मनुष्येण परिचर्या: प्रयत्नत:।
पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च भरतर्षभ,विदुर
भरतश्रेष्ठ ! पिता , माता अग्नि ,आत्मा और गुरु – मनुष्य को इन पांच अग्नियों की बड़े यत्न से सेवा करनी चाहिए।
सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमय: पिता।
मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत्।।

अर्थात् माता सर्वतीर्थ मयी और पिता सम्पूर्ण देवताओं का स्वरूप हैं, इसलिए सभी प्रकार से यत्नपूर्वक माता-पिता का पूजन करना चाहिए। जो माता-पिता की प्रदक्षिणा करता है, उसके द्वारा सातों द्वीपों से युक्त पृथ्वी की परिक्रमा हो जाती है। माता-पिता अपनी संतान के लिए जो क्लेश सहन करते हैं, उसके बदले पुत्र यदि सौ वर्ष माता-पिता की सेवा करे, तब भी वह इनसे उऋण नहीं हो सकता।।
श्राृद्व का पक्ष केवल दिवंगत हो चुके अपने पूर्वजो,अथवा मांता पिता के पूजन स्मंरण का पक्ष ही नही,अपितू,अपने जीवित बूजूर्ग जनो के प्रति निभाय जाने वाले उतरदाइत्वो के प्रति भी और सजग होकर उनके साज सम्भाल और सेवा सुश्रृवा को लेकर गंम्भीरता से व्यवहार अपनाना भी याद,,!दिलाता है,,!!

✍️…आचार्य चाणक्य,,!!🙏🌹👍🏻

।। जय सियाराम जी।।
।। ॐ नमः शिवाय।।

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