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गुस्ताखियाँ

गुस्ताखियाँ

अपनी नज़रों से कह दो,
कि यूँ गुस्ताखियाँ न करें,
उनका यूँ देख कर झुक जाना,
दिल धड़कता है मेरा;

लम्बी मुलाकात नहीं होती,
ज्यादा बात नहीं होती,
पर उन चंद अल्फ़ाज़ों के लेन-देन,
से ही दिन कट जाता है मेरा;

कुछ खोये-खोये से रहते हो,
भरी महफ़िल में तुम भी,
शायद डूबे रहते हो मेरी यादों में,
ऐसा ही कुछ अंदाजा है मेरा;

ज्यादा उम्मीदें मत रख,
ज्यादा गुस्ताखियाँ मत कर,
अपनी हद में रह ,
मोहब्बत में मत पड़,
अक्सर वक्त-बेवक्त ,
दिल यही समझाता है मेरा;

पर तेरे सामने होने पर,
दिल जाने कहाँ खो जाता है मेरा ,
तब न हद याद रहती है,
न दिमाग की हिदायतें,
तुझे ही पाना चाहता है,
फिर पूरे हक़ से दिल मेरा,
तब मेरा ही कहाँ रहता है,
ये तो हो जाता है तेरा।
💖💖💖

—(Copyright@भावना “तरंगिणी”)—

Read more…..एक कविता तुम्हारे लिये

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