बम्बई, मुंबई या पारसी स्थान

Medhaj News 28 Jul 20 , 14:42:46 Special Story Viewed : 852 Times
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भारत की आर्थिक राजधानी बम्बई में कई फ़िल्म बनती है, मगर बम्बई या मुंबई आखिर किसने खोजा या बनाया। जिस आइसक्रीम का मजा हर मौसम में लेते हैं, उसे पहली बार एक पारसी व्यवसायी 1830 में मुम्बई लाए थे और उन्होंने अपने यहां आइस हाउस बनाया, जहां बॉस्टन से आने वाली आइसक्रीम रखी जाती। उनकी आइसक्रीम हर डिनर पार्टी की शोभा बनती। लोग बताते हैं कि पहली बार आइसक्रीम खाने  से कइयों को जुकाम हो गया था। उनकी यह धनवानपन, चीन के साथ अफीम कारोबार की बदौलत थी।

पारसियों और चीनियों का सदियों से बहुत करीबी कारोबारी रिश्ता रहा है। ऐसा रिश्ता कि मुम्बई का एक बड़ा हिस्सा चीन से होने वाले व्यापार की कमाई से बना है। दो हज़ार साल पहले ईरान के व्यापारियों यानी पारसियों से चीन को बहुत फ़ायदा होता था। वहां के सम्राट ने इनकी सहूलियत के लिए रास्ते में पड़ने वाले अपने शहरों में अग्नि मंदिर तक बनवाए। 18वीं सदी में भारत के पारसी व्यापारियों के चीन सागर के इलाक़े में क़ामयाबी के झंडे गाड़ने की कहानियां मशहूर हैं।

पारसियों को पहले पर्सिया कहते थे जो आज  के ईरान में थे उनका रिश्ता ,चीन से  200 ईसा पूर्व से है। लगभग 500 ईस्वी के आसपास वहां के सासानी शासकों के साथ चीन ने राजनयिक रिश्ते बनाए और सिल्क रूट पर कारोबार बढ़ाया। जो अब चीन फिर करना चाहता है पारसी लोग चीन से रेशम, कागज़, कपूर और इत्र यूरोप तक ले जाते और ईरान से वहां कार्पेट, फर्नीचर, चमड़ा और मोती ले जाए जाते। भारत से भेजी जाने वाली अफीम के कारोबार की वजह से ही ब्रिटेन से चीन का युद्ध हुआ था। उसमें मिली करारी हार के बाद चीन को अपना द्वीप हॉन्गकॉन्ग ब्रिटेन को सौंपना पड़ा। इस घटना को लेकर चीन के लोगों में अब भी कड़वाहट है, लेकिन ज्य़ादातर लोगों को इसके पारसी कनेक्शन का पता नहीं है। जहां तक अफीम के व्यापार की बात है तो इसमें अंग्रेजों की एक मजबूरी भी थी। वे चाय के बदले इसका चोरी-छिपे लेनदेन करते थे। ब्रिटेन के धनवान कारोबारियों को चाय चाहिए थी, क्योंकि वहां उसकी बहुत मांग थी। लेकिन बदले में चीन के सम्राट को वहां का कुछ भी लेना पसंद नहीं था। अंग्रेज मोटे तौर पर बदले में चांदी देते, लेकिन यह सब देर तक चलना मुमकिन नहीं था। हाथ तंग होने लगा तो उन्होंने भारत की अफीम को जरिया बनाया।

ऐसे में विदेशियों के साथ काम करने में कोई दिक्क़त महसूस नहीं करने वाले पढ़े-लिखे और हिसाब-किताब में होशियार पारसी व्यापारी इस धंधे में हाथ नहीं लगाते तो कोई और लगाता। चीन को अफीम कलकत्ता से बड़े पैमाने पर भेजी जाती थी, लेकिन वहां अंग्रेजों का एकाधिकार था। जब मालवा में किसानों ने कपास छोड़ अफीम उगाना शुरू किया तो बॉम्बे इसका बड़ा केंद्र बन गया। बॉम्बे में तब अंग्रेजों की कुछ खास पकड़ नहीं थी। 1680 के दशक में जब वैकल्पिक बंदरगाह के तौर बॉम्बे बसा तो वहां के पारसी यहां आ गए। बॉम्बे से चीन जाने और वहां ट्रेडिंग कंपनी शुरू करने वाले पहले पारसी हीरजी जीवनजी रेडीमनी थे। उन्होंने कैंटन में डच ईस्ट इंडिया कंपनी के इलाके में काम शुरू किया।

रेडीमनी के बाद चीन पहुंचे जमशेदजी जीजीभाई, वही आइसक्रीम वाले पारसी। उनकी जेजे एंड कंपनी की बिजनेस पार्टनर थी जार्डिन मैथरसन। उसके विलियम जार्डिन चीन में कैंटन के पहले हांग यानी बिचौलिये थे। एक भारी मुसीबत में दोस्त बने जार्डिन और जमशेदजी ने साथ मिलकर चीन में अफीम कारोबार से बड़ा पैसा और नाम कमाया।

18वीं सदी में कारोबार के लिए चीन जाने वाले पारसी समुदायों में बानाजी, वाडिया, कामा, विकाजी और पारेख प्रमुख थे। गौर करने वाली बात यह है कि 1864 में हॉन्गकॉन्ग एंड शंघाई बैंक के संस्थापक निदेशक भी पारसी थे। उनके नाम थे पलोनजी फरामजी और रुस्तमजी धनजीशा।

जहां तक अफीम के धंधे में पारसियों को क़ामयाबी मिलने की बात है तो आम सोच यह है कि उन्हें समय और ज़रूरत के हिसाब से ढलने, अंग्रेजों से दोस्ताना रिश्ते रखने और विदेश जाने से परहेज नहीं करने से सफलता मिली।  प्रेसिडेंसी में पारसियों का अफीम का धंधा इसलिए जमा क्योंकि यहां ईस्ट इंडिया कंपनी का दबदबा नहीं था। कलकत्ता में अंग्रेज़ों का एकाधिकार था, इसलिए भारत के शुरुआती उद्योगपति और नामी धनवान द्वारकानाथ टैगोर को भी उस धंधे में नाकामी हाथ लगी।'

चीन के साथ कारोबार में अफीम के जरिए अकूत पैसा कमाने वाले पारसियों में बड़ा नाम जमशेदजी जीजीभाई का आता है। दो सदी पहले 40 साल की उम्र में भारत के सबसे बड़े धनवानों में शुमार होने वाले जमशेदजी को आप उनकी बनाई इमारतों से जानते होंगे। उनकी दान की हुई जमीन पर ही बना है मुंबई का जेजे हॉस्पिटल। उनकी ही देन है जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स। जमशेदभाई ने ही पुणे में वॉटर सप्लाई सिस्टम तैयार करने का दो तिहाई खर्च उठाया था। उनकी पत्नी आवाबाई भी परोपकार के मामले में आगे रहती थीं। माहिम दरगाह को मुख्य भूमि को जोड़ने वाली सड़क उन्होंने ही बनवाई थी ताकि श्रद्धालुओं को दिक्कत न हो और उन्हें सरकार को चुंगी न देना पड़े।जहां तक चीन में विदेशियों के करोबार और दबदबे की बात है तो 18वीं सदी खत्म होते-होते वहां का कारोबार डचों के हाथों से निकलकर अंग्रेजों के पास आ गया। चीन के सम्राट ने विदेशियों को सिर्फ कैंटन में कारोबार की इजाजत दी थी लेकिन दो अफीम युद्धों के बाद काराबार कई बंदरगाहों तक पहुंच गया। लेकिन यह कैंटन ही था जहां पारसियों में यूरोपियन फानूस से लेकर लकड़ी के फर्नीचर का टेस्ट डिवेलप हुआ।

बॉम्बे के पारसियों के लिए अफीम का धंधा ही मोटे मुनाफे वाला नहीं था। बहुत से पारसी उससे निकलकर टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग में चले गए। उसमें उन्हें 1860 के अमेरिकी गृह युद्ध से बहुत फायदा हुआ। उनके टेक्सटाइल में जाने की वजह यह थी कि चीन में अफीम बेचने से हो रहा मुनाफा भारत लाने में उन्हें दिक्कत होने लगी थी। ऐसा ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ लेनदेन का उनका एक सिस्टम टूटने के कारण हुआ। दुनिया में पारसी सवा लाख की आबादी तक सिमट कर रह गए पारसियों में से हॉन्गकॉन्ग में केवल 204 और चीन में सिर्फ 21 बचे हैं। भारत में दुनिया में सबसे ज्यादा 61 हज़ार पारसी हैं।-एक आर्य


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      Commented by :Praveen kr. Jha
      29-07-2020 22:16:50

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      Commented by :Sandeep kumar yadav
      29-07-2020 22:12:12

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      Commented by :Ajay Kumar Azad
      28-07-2020 19:56:09

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      Commented by :Aditya Yadav
      28-07-2020 19:28:33

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      Commented by :BAL GANGADHAR TILAK
      28-07-2020 17:52:17

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      Commented by :LAL KRISHNA LAL
      28-07-2020 17:43:18

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      Commented by :Mohammad Ashhab Alam
      28-07-2020 17:29:48

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      Commented by :Sirajuddin Ansari
      28-07-2020 15:09:19

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      Commented by :Sushil Kumar Gautam
      28-07-2020 14:58:07

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