गज़ल - माना मुकद्दर में तुम नहीं हो........

Medhaj News 8 Aug 20 , 17:04:39 Special Story Viewed : 2874 Times
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1)  मेरी अभिलाषा​

2)  तन्हाई​

3)  मध्यम वर्गीय

4) झूठ की दुनिया​



दोस्तों आज मैं अपनी पहली गज़ल पेश कर रहा हूं आशा करता हूंँ आप लोगों को पसंद आएगी अपनी प्रतिक्रिया एवं सुझाव अवश्य दीजिएगा

माना मुकद्दर में तुम नहीं हो,

चाहत का इसमें कसूर क्या है |

प्यारी लगी रोशनी चंद्र की,

सूरज बिना वजूद क्या है |  


महक तुम्हारी फिजा में घुल कर,

जहान में मेरे समा रही है |

तुम्हारी जुल्फों ने छेड़ा मुझको,

बहक गया तो कसूर क्या है |


माना मुकद्दर में तुम नहीं हो,

चाहत का इसमें कसूर क्या है |

नशीली आँखें तुम्हारी देखो, 

जराॆ जराॆ पिला रही है |


बेहोश हो जाऊंँ मैं तो इसमें,

मेरी कोई खता नहीं है |

माना मुकद्दर में तुम नहीं हो,

चाहत का इसमें कसूर क्या है |


तुम्हारी यादों के सिलसिले हैं,

पल पल मुझको रुला रहे हैं |

जलोगे तुम भी तो इस अगन में, 

जो आग मुझको जला रही है |


माना मुकद्दर में तुम नहीं हो,

चाहत का इसमें कसूर क्या है | 

प्यारी लगी रोशनी चंद्र की,

सूरज बिना पर वजूद क्या है |


माना मुकद्दर में तुम नहीं हो,

चाहत का इसमें कसूर क्या है | 



       स्वरचित

----ललित खंडेलवाल----



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