कविता - *गृहिणी* 

Medhaj News 21 Jul 20 , 12:38:37 Special Story Viewed : 7195 Times
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दोस्तों लॉकडाउन में जो सबसे ज्यादा बिजी हुई 'गृहिणी' उन पर कुछ पंक्तियां पेश कर रहा हूं आशा करता हूं आप लोग को पसंद आएगी अपनी प्रतिक्रिया जरूर दीजिएगा कैसा यह संकट आया है, कैसी यह विपदा आई है। कैसा यह संकट आया है, 

कैसी यह विपदा आई है,

गृहिणी के सर पर मानो,

कहर बनकर छाई है। 

रखती है सबका ख्याल, 

करती है सब की देखभाल। 


अब तो झाड़ू पोछा और बर्तन,

मांजने की भी नौबत आई है। 

छोले भटूरे, पाव भाजी, पिज़्ज़ा, 

बर्गर और भी क्या क्या बना रही है।
 

पसीने में है तरबतर, 

फिर भी हर गृहणी मुस्कुरा रही है। 

सब कुछ है बंद, सब बैठे हैं घर मगर, 

गृहणी को तो दुगने काम की,


चिंता खा रही है। 

पिता के घर राज करने वाली बेटी,

ससुराल में सब कुछ निभा रही है। 

कामकाजी महिलाओं का है और भी बुरा हाल,

लैपटॉप के आगे बैठ सब्जी काट रही है।
 

एग्जीक्यूटिव बन लैपटॉप पर देती आर्डर,

बाद में मेड बन घर का काम भी निपटा रही है। 

दोनों ड्यूटी बखूबी निभा रही है,

बच्चों के लिए गुरु बन जाती है, 

पति के लिए प्रेमिका बन जाती है। 


तो सास-ससुर के लिए सेविका भी बन जाती है,

पर खुद के लिए कुछ नहीं कर पाती है। 

मकान को घर बनाती है, 

सारा जीवन इस पर कुर्बान कर देती है। 


ये गृहणी ही है जो घर को स्वर्ग बनाती है, 

ये गृहिणी ही है जो घर को स्वर्ग बनाती है। 



       ----स्वरचित----        

      ललित खंडेलवाल



 


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