खोया पाया - एक अभिव्यक्ति (दया संग्रह)

Medhaj News 12 Jul 20 , 14:55:01 Special Story Viewed : 11992 Times
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मानव जीवन मे मनुष्य के पेट की भूख जीवन को निरंतर गतिशील रखती है। पेट की भूख शांत रहती है तब उसकी मानसिक भूख, तामसिक भूख, आध्यात्मिक भूख आदि जागृत हो उठती है। यदि पेट की भूख न हो तो जीवन चक्र बाधित हो जायेगा। मस्तिष्क सोचना छोड़ देगा, आदमी कर्म करना छोड़ देगा। आदमी के सोचने की शक्ति ही है, जो उसे पशुओं जानवरों से अलग करती है। हम भाग्यशाली हैं कि हम एक कृषि प्रधान देश के नागरिक हैं। हमारे देश में अन्न का प्रचुर उत्पादन होता रहा है | भूख शांत हुई तो शारीरिक ताकत और सोचने समझने की शक्ति प्रबल होती गई । सीमा से बाहर जाकर हमने ईश्वर प्रदत्त संसाधनों का शोषण करना, दुरूपयोग करना प्रारंभ कर दिया। परिणामस्वरूप हम अपनी मूलभूत आवश्यकताओं, संसाधनों की उपेक्षा करने लगे या कहें हम उन्हें खोने लगे। 



ऐ जिंदगी तू कितनी खूबसूरत है



हमने क्या खोया इसे समझने के लिए हमें इसका आंकलन और मूल्यांकन उस समय से करना चाहिए जब से हमें आजादी मिली थी | अर्थात  15 अगस्त 1948 से। हमे नयी- नयी आजादी मिली थी। हमारी आबादी कम थी, हमारी आवश्यकताएं कम थीं। हम मिल जुल कर रहने वाले लोग थे। हमारे खेतों में अनाज की फसलें लहलहाती रहतीं थीं। हम मेहनतकश थे। हम अपने संस्कारों, परंपराओं, रीति-रिवाजों का अनुपालन करते थे। ये वो समय था जब आदमी अपनी ईमानदारी, प्रतिष्ठा, मान सम्मान के लिए मर मिटने को भी तैयार रहता था। 

आजादी के बाद के आने वाले वर्षों मे शनैः शनैः स्थिति एकदम पलट गयी। हमारा देश तब से निरंतर प्रगति करता जा रहा है लेकिन हम उस तरक्की की भारी कीमत भी चुकाते जा रहे हैं। ध्यान देने की बात यह है कि हम आधुनिक भारत की चाहे जितनी भी ऊंची मीनार खड़ी कर लें पर यह भी ध्रुव सत्य है कि ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं वही खड़ी रहती हैं जिनकी नींव मजबूत होती है। हम आधुनिकता का अनुसरण करें, नवीनता को स्वीकारें विकसित देशों से कन्धे से कन्धा मिला कर चलें | लेकिन इसकी जड़ो में हमारे प्राचीन संस्कार, परम्पराए, सामाजिक मूल्य, ईमानदारी मेहनत, आपसी सहयोग, भाईचारा सबको साथ लेकर चलने की भावना का समावेश होना अति आवश्यक है | 



शर्मिन्दा हूँ फिर भी मै जिन्दा हूँ



इस सत्तर बहत्तर वर्षो में हमारे देश की आबादी चार पांच गुना बढ़ चुकी है | इसी के अनुपात में देश के संसाधनों को हमने निचोड़ा भी खूब है, किन्तु कभी उन संसाधनों को संरक्षित करने के बारे में  नहीं सोचा या सोचना नहीं चाहते क्योकि सहयोग का स्थान हमारे स्वार्थ ने ले लिया है| फलस्वरूप संसाधनों के दुरुपयोग को बल मिला | 

       अब मैं वर्तमान की बात करना चाहूंगा | ईश्वर प्रदत्त संसाधनों में सर्वोपरि है भोजन, तन ढकने के लिए वस्त्र तथा रहने के लिए आवास | वस्त्र और आवास मानव के तकनीकी ज्ञान और प्रयास का प्रतिफल है किन्तु भोजन पूर्णतया ईश्वर की कृपा और आशीर्वाद से ही सुलभ होता है | आइये जरा पिछले तीन चार महीने के अंतर्गत देश की स्थिति पर नज़र डालें| पूरा देश कोरोना वायरस के प्रकोप से जूझ रहा है | ऐसा प्रतीत होता है | मानो समय थम गया है | प्रत्येक नागरिक अपने परिवार के साथ घरों में बंद हो कर अपना जीवन बचाने के लिए प्रयासरत है | ऐसे में हमारे देश की एक तिहाई आबादी उन लोगो की है जो रोज़ सवेरे घर से रोटी कमाने निकलते है और दिनभर पसीना बहाकर जो कुछ भी कमाकर घर पहुँचते है तब उनके घर का चूल्हा जलता है | लेकिन आवश्यक नहीं की रोटी सब्जी के साथ खायेंगे या पानी के साथ घोटेंगे या सिर्फ आशाभरी उम्मीद के साथ पानी पीकर ही सो जायेंगे | 



कोरोना और मजदूर (दया संग्रह)



दूसरी तरफ देश के दो तिहाई वो संपन्न लोग है जिनकी चिंता ये है कि आज क्या खाये? ये वो वर्ग है जो सुबह का शाम को, आज का भोजन कल खाने से परहेज करता है | यही नहीं परिवार के हर सदस्य की चाहत के अनुसार इनका भोजन बनता है | स्वाभाविक है भोजन आवश्यकता से अधिक बनेगा तो जो भोजन बच जाता है वह कूड़ेदान में फेक दिया जाता है | इनका पालतू कुत्ता भी अपने स्वादानुसार भोजन पता है| यह एक विडंबना ही है कि भोजन की आस में एक परिवार भूखा ही सोता है वही एक संपन्न परिवार बचे हुए भोजन को 'कूड़े में फेक देता है | 

         हमें यह स्थिति स्वीकार नहीं है न होनी चाहिए| इन तथाकथित संपन्न वर्ग से मैं कहना चाहता हूँ और पूरे अटल विश्वास के साथ कहना चाहता हूँ कि जितना भोजन फेंकोगे, जिस दिन एक व्यक्ति के पेट भरने लायक भोजन कूड़ेदान में पहुँच जायेगा उसी के अनुरूप तुम्हे एक दिन भूखा रहना पड़ेगा क्योकि तुमने ईश्वर प्रदत्त संसाधन का दुरुपयोग किया है | 

         अतः आज से क्या अभी से गांठ बांध लें कि उतना ही भोजन बने जितना खाकर समाप्त हो सके | एक बहुत प्रचलित वाक्य है कि "उतना ही लो थाली में व्यर्थ न जाये नाली में "| और यदि भोजन बचता ही है तो उसे सफाई और शुद्धता के साथ आस पास के उन उचित लोगो में बांट दे जिनके स्वप्न में भी भोजन का दिखना आशा और उम्मीद की किरणों को जन्म देता है | आपके इस भावना से किये गए प्रयास का प्रतिफल ईश्वर आपको कब और किस प्रकार देगा इसका अंदाज़ा भी आप नहीं लगा सकते और कुछ नहीं तो आपको संतुष्टि प्राप्त होगी वह धन सम्पदा के भंडार से भी सुलभ नहीं होगी| सर्वोपरि आप जीवन पर्यन्त कभी भूखे नहीं रहेंगे |



*******श्री दया प्रकाश पाठक*******  



 


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    Comments

    • Really beautifully discribe ..................

      Commented by :Deependra Yadav
      03-08-2020 00:32:56

    • Beautifully explained each topic.

      Commented by :Badre Alam
      13-07-2020 09:52:16

    • Nice feelings

      Commented by :Ajay Kumar Azad
      12-07-2020 22:28:29

    • लाजवाब लेख जिसे पढ़ना बहुत अच्छा लगता है

      Commented by :Ankita
      12-07-2020 20:41:46

    • एक अभिव्यक्ति : सुन्दर अभिव्यक्ति

      Commented by :Sudha
      12-07-2020 20:16:15

    • बहुत ही बेहतरीन संदेश दिया है लेखक ने इस लेख के माध्यम से। सभी को इससे संदेश ग्रहण करना चाहिए और नमक में लाना चाहिये।

      Commented by :Bhawana Maurya
      12-07-2020 19:23:07

    • Okk

      Commented by :Harendra Singh
      12-07-2020 18:06:20

    • Nice line

      Commented by :Mazhar
      12-07-2020 18:05:13

    • Nice

      Commented by :Amit Kumar
      12-07-2020 16:08:57

    • Good thought

      Commented by :Md Nazir
      12-07-2020 15:09:47

    • Nice

      Commented by :Vikalp Gupta
      12-07-2020 15:08:07

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