कविता - पत्थर दिल... (एक प्रयास)

Medhaj News 10 Jul 20 , 16:54:53 Special Story Viewed : 8012 Times
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1) धूप में पथिक...​
2) आओ फिर...
3) झुग्गियां...


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क्यों कुचल रहे हो,रौंद रहे हो,

तिल तिल कर क्यों मार रहे हो।

रोटी को तरसाते हो क्यों,

क्यों पत्थर दिल हो रहे हो।


तुमने खोई करूणा सारी,

छोड़ा हाथ समझ बीमारी।

बूढ़ों की दिखती लाचारी,

हालत पर क्योंँ हँस रहे हो।


सेवाभावों से दूर चले,

अपनों को ही भूल चले।

नेह का कैसा सिला दिया,

जीते जी क्यों मार रहे हो।


नैतिकता को भूल चले,

भौतिकता की राह चले।

दिखे नहीं बूढ़ी आँखें,

रिश्ते क्यों झुठला रहे हो।


खिलती मुस्कानों को भूले,

घुटनों पर झूलों को भूले।

मँहगाई की आड़ को लेकर,

जड़ अपनी क्यों काट रहेहो 


क्यूँ बंदिशें भाती नहीं,

क्यूँ बात कोई सुहाती नहीं।

बूढ़ा होना कोई अभिशाप नहीं,

यह पूर्व जन्म कापाप नहीं।


कोई आस नहीं इनके दिल में,

फिर इनको क्यों धिक्कार रहे हो।



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----डा.बंदना जैन(कोटा,राजस्थान)----


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