कविता - गुनगुनाती धुप और परिंदे......(एक प्रयास)

Medhaj News 27 Jul 20 , 13:09:28 Special Story Viewed : 2775 Times
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1) धूप में पथिक...​

2) आओ फिर...

3) झुग्गियां...

4) पत्थर दिल...

5) हँसने दो .....

6) बया...



सुबह गुनगुनी धूप खिली है, आओ पानी मे खेलें।

शीत अगर लग जाये हमको, उन्हें सुखाने पर फैलें।।


कभी धरा पर कभी गगन में, विचरण हम उन्मुक्त करें।

मस्ती में आकर हम सब, एक दूसरे को ठेलें।।


गूंज उठे कलरव से अपने दसों दिशाएँ पूर्ण तरह।

आज बाँट लें खुशियां मिलकर, जीवन का आनंद ले लें।।


जब तक जायें खेल- खेल कर अपने घर में हम लौटें।

भाई चारे रहे परस्पर, उगे प्रेम की नित बेलें।।



---डा.बंदना जैन(कोटा,राजस्थान)----



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