कविता - कोरोना और मजदूर (दया संग्रह)

Medhaj News 3 Jul 20 , 18:04:07 Special Story Viewed : 14588 Times
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मेरी पिछली कविता पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें--:

1) ऐ जिंदगी तू कितनी खूबसूरत है

2) शर्मिन्दा हूँ फिर भी मै जिन्दा हूँ

3) वफ़ादारी



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अपना गाँव घरबार था छोड़ा,

अपना भी परिवार था छोड़ा,

दूर महानगरों में हम,

मजदूरी करने आये थे ,

कुछ अरमान साथ में लाये थे,

जी हाँ, हम रोटी कमाने आये थे।


काम मिला परिणाम मिला,

मन को थोड़ा आराम मिला,

कच्चे घर को पक्का कर डाला,

बहनों ने डाली वरमाला,

तीज और त्योहार मनाने,

शादी ब्याह की रस्म निभाने,

परदेसी बनकर जाते थे,

फिर मालिक की सेवा करने,

लौट नगर को आते थे।


ठीक ठाक चल रहा था जीवन,

कि समय ने ऐसी करवट बदली,

कोरोना महामारी ने

क्या से क्या कर डाला?

भूख प्यास और छत के दुःख से,

पहली बार पड़ा था पाला।


जब तक पूंजी थी अंटी में, 

किसी तरह झेला उस पल को,

रेल बन्द थी, मोटर का परिचालन भी,

सडकें सूनी, बाज़ार थे सूने,

छुपे हुए थे सब घर में,

अपनी-अपनी जान बचाने,

हम सब तो मजदूर थे साहब

हम बेगाने थे बिना ठिकाने।


पेट की ज्वाला जब भड़की तो,

गाँव की याद सताने लगी,

बूढ़े माँ-बाप लाचार गाँव में,

उनकी याद भी आने लगी,

गरीब मजदूरों के सरंक्षण का,

आदेश तो बहुत प्रभावी था,

पर राजनीति कुत्सित चालों से,

हर पल उस पर हावी था।


हम मेहनतकश हैं,

दिल से भोले भाले हैं,

हम क्या जाने सामने वाले,

कितने दिल के काले हैं, 

ठान लिया हम सब ने,

अब न सहा जायेगा,

घर गाँव तलक की दूरी,

पग से ही नापा जायेगा।


सिर पर गृहस्थी का बोझ लदा था,

पीछे औरत की उंगली पकड़े,

छोटा बच्चा भी साथ खड़ा था,

जेठ दोपहरी तपती सडकें,

सडकों पर भारी रेला था,

लाखों की भीड़ मे लेकिन,

हर जीवन अकेला था,

मौत खड़ी इधर भी थी पर,

उधर आशा का नया सबेरा था।

परदेसी बनकर आये थे,

प्रवासी बनकर लौट रहे थे,

राजनीति के बड़े खिलाड़ी,

हमारे जलते पेटों पर,

चुनावी रोटी सेंक रहे थे।



आपकी समीक्षाओं/ प्रतिक्रियाओं की अपेक्षा में--->

---श्री दया प्रकाश पाठक (दया संग्रह)---


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    Comments

    • Bahut he marmik chitran kiya hai ashaye or Sam insaan la jo jindgi ki utha patak main samai key thapedo ko zhelta chala ja raha hai. Thanks for sharing.

      Commented by :Chander Shekhar
      13-07-2020 05:14:41

    • Very nice

      Commented by :Kunal chandra
      07-07-2020 09:24:49

    • Wahhhh kya bat jakhm dijiye dhire dhire

      Commented by :Kavita tripathi
      04-07-2020 22:10:16

    • Very nice line.

      Commented by :Raghunath Patra
      04-07-2020 17:08:40

    • Very Nice Poem

      Commented by :Vartika Mishra
      04-07-2020 13:53:06

    • Nice

      Commented by :Suraj patel
      04-07-2020 06:03:56

    • Nice poem

      Commented by :Ajay kushawaha
      03-07-2020 23:13:40

    • Heart Touching

      Commented by :Amit Kumar
      03-07-2020 22:28:29

    • Nice

      Commented by :Rajesh Kumar
      03-07-2020 22:16:36

    • वाह , मजदूरों की वेदना का मार्मिक चित्रण

      Commented by :Sudha
      03-07-2020 21:53:20

    • Very heart touching

      Commented by :Vikas Yadav
      03-07-2020 21:52:32

    • Heart touching

      Commented by :Aslam
      03-07-2020 20:43:14

    • Good

      Commented by :Zain
      03-07-2020 20:31:16

    • Nice poem

      Commented by :Pravesh Kumar Satyarthi
      03-07-2020 20:12:56

    • nice

      Commented by :Shiv kumar singh
      03-07-2020 20:02:49

    • Best

      Commented by :Vikalp Gupta
      03-07-2020 19:59:10

    • Very nice

      Commented by :Nidhi Azad
      03-07-2020 19:46:31

    • nice poem

      Commented by :Govind Lal
      03-07-2020 19:44:12

    • Super

      Commented by :Ajay Kumar Azad
      03-07-2020 19:37:10

    • Nice poem

      Commented by :Ashish kumar nainital
      03-07-2020 19:15:26

    • Very Nice

      Commented by :Pawan Tiwari
      03-07-2020 18:46:29

    • Nice line

      Commented by :Mazhar
      03-07-2020 18:38:25

    • Super

      Commented by :Sameer Siddiquee Almora
      03-07-2020 18:22:14

    • Nice line.

      Commented by :Bal Gangadhar Tilak
      03-07-2020 18:21:18

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