कविता - फ़सल

Medhaj News 10 Jul 20 , 15:06:50 Special Story Viewed : 2528 Times
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चिलचिलाती धूप में,

पसीने के हर बूंद में,

स्वप्न पलता सुखद का,

हरियाली की सुबह का,


चुपचाप खड़ा वह वृद्ध किसान,

हड्डियां भी हो चलीं बेजान,

फिर भी कर्मरत खेतों में,

लगाकर अपना पूरा ध्यान,


दोनों हाथ पकड़ कुदाल,

बार बार करता प्रहार,

पसीने से लथपथ शरीर,

ताकि हो फसल तैयार,


प्यास से सूख कंठ जब जाता,

दूर दूर कुछ नज़र ना आता,

सुनसान दिखा हर डगर रास्ता,

माथे से पसीना​ तब टपक है जाता,


फटे कपड़े, फटी धोती,

बहती गर्म हवा धूप की,

लगती बदन में आग सी,

फिर भी तोड़ रहा वह मिट्टी,


आसमां को देखा एक नजर,

बेसहारों की तरह,

बोझिल ना हो जीवन का डगर,

आंखों के हो सपने सच अगर,


अदृश्य हुई सूर्य की किरण,

शाम हुई, चली ठंडी पवन,

कुदाल रख कंधे पर,

चल पड़ा वह वृद्ध किसान,


समय बीता, फूटा अंकुर,

उस पर पड़ी बारिश की बूंद,

खिलने
लगे नए नए फूल,

उड़ चुके अब दुख के धूल,


लहराई धान की हरियाली,

चारो तरफ़ आयी खुशहाली,

कई मौसम बाद उन चेहरों पर,

उम्मीदों की मुस्कान है! आई ​



----अमन कुमार राय------



मेरी पिछली कविता पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें---->जनाजा इंसानियत का​


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