कविता - दिल से....

Medhaj News 31 Jul 20 , 17:06:08 Special Story Viewed : 3382 Times
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भूख में चाँद भी रोटी सा दिखे,

पेट से सींचने की सीमाएं नहीं होती,

चले पैरो पड़े या कमर अकड़ जाये,

जेब खाली
 हो तो इनकी दवाएं नहीं होती | 

अकेला तन्हा खाने कमाने की आस में,

घर से दूरी और काम करने की मजबूरी,

कितना भी करें जतन घर के पास होने का,

किसकी जरूरतें मुँह बाए नहीं होती |


नज़र सूनी सी मंज़िल पर टिकी हो,

वहाँ जाकर भी फिर आराम न हो,

क्या किसी को उनका ख्याल आता होगा,

जरा सोचो क्या उनकी माएं नहीं होती |


ढूढ़ते रहते थे हम जिसे यूँ दरबदर,

मेरी आवाज़ पर रहता है जो बेअसर,


ईंट गारों का शहर, ऊँची मीनारों का शहर,

दिलों के बीच, ये उठती दीवारों का शहर,


दिल के कोने में बसा था,

किसकी फिर लगी है नज़र,

किसी को दे ये सकून,

तो किसी पे बरपायें कहर,


हम बढ़े साथ तो ये बढ़ता रहा, 

नित नयी मंज़िल चढ़ता रहा,

हमारी याद में जैसा था ये शहर,

अब कही नहीं आता है नज़र |  


कुछ के ख्वाबों तो कुछ की यादों का शहर,

किसी भी मंज़िल तो किसी का ये सफर,


ईंट गारों का शहर, ऊँची मीनारों का शहर,

दिलों के बीच, ये उठती दीवारों का शहर,




----V.D Ambardar-------

(PUVVNL Varanasi)



 


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