कविता - मानवता बनाम नैतिकता (दया संग्रह)

Medhaj News 16 Jul 20 , 19:18:13 Special Story Viewed : 14847 Times
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मेरी पिछली कविता पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें--:

1) ऐ जिंदगी तू कितनी खूबसूरत है

2) शर्मिन्दा हूँ फिर भी मै जिन्दा हूँ

3) वफ़ादारी

4) कोरोना और मजदूर (दया संग्रह)

5) गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वरः गुरुसाक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः

6) मौन की व्यथा 



मैं तो हर पल तुम्हारे साथ थी, 

फिर तुम्हे गिरने की क्या ज़रुरत थी |  

बचपन से मैंने तुमको गिरते देखा है, 

अब तो वह भी दिख जाता है, जो की अनदेखा है


क्योकि उसमे समाहित मेरी भी नियति रेखा है | 

कुछ ऐसा नहीं हो सकता क्या ? की तेरा गिरना रुक जाये | 

मैं भी थोड़ी संभल जाऊँ, 

कुछ मेरी भी इज़्ज़त बन जाये | 
 

आखिर मैं भी उसी धरती की हूँ, 

जिस पर तुम प्रतिपल गिरते हो |  

अरे मैं तुम्हारी मानवता हूँ, 

और तुम मेरी नैतिकता हो ||



आपकी समीक्षाओं/ प्रतिक्रियाओं की अपेक्षा में--->

*******श्री दया प्रकाश पाठक*******  


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    Comments

    • Nice

      Commented by :Kunal chandra
      22-07-2020 19:39:36

    • Good

      Commented by :priya
      17-07-2020 18:00:48

    • NICE

      Commented by :Rohit gautam
      17-07-2020 10:41:05

    • Nice poem

      Commented by :Anand kumar
      17-07-2020 07:59:09

    • Nice

      Commented by :PRASHANT KUMAR
      16-07-2020 23:20:23

    • Nice poem

      Commented by :Amit Kumar
      16-07-2020 22:53:29

    • Nice

      Commented by :Shiv Kumar singh
      16-07-2020 21:46:34

    • Nice poem

      Commented by :Amit jalaun
      16-07-2020 21:18:31

    • Nice

      Commented by :Harendra Singh
      16-07-2020 20:08:18

    • Nice

      Commented by :Sonu Kumar
      16-07-2020 19:55:17

    • Nice poem

      Commented by :Rinku Ansari
      16-07-2020 19:35:50

    • Nice

      Commented by :BHUPENDRA MAHAYACH
      16-07-2020 19:29:49

    • Nice

      Commented by :Sirajuddin Ansari
      16-07-2020 19:22:13

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