कविता - शर्मिन्दा हूँ फिर भी मै जिन्दा हूँ (दया संग्रह)

Medhaj News 30 Jun 20 , 15:04:43 Special Story Viewed : 16603 Times
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मेरी पिछली कविता पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें----> ऐ जिंदगी तू कितनी खूबसूरत है



हारा हुआ मुसाफ़िर हूँ ख़ुद से ही शर्मिन्दा हूँ

समझ नहीं आता है कि क्यों अब तक मैं जिन्दा हूँ

जिन जिन को खुशियाँ देने मे लगा रहा

अफसोस वो कभी खुश हो न सके


सुख का दामन भी भर न सका

अरमान सभी ठुकरा कर के

आज खड़ा लाचार अकेले

खोज रहा उन लमहों को

आखिर चूक कहाँ हो गई


पूरा करने मे उन सपनों को

व्यर्थ हुआ जीवन मेरा

इस सोच के साथ बस जिन्दा हूँ

सचमुच बहुत शर्मिन्दा हूँ फिर भी मै जिन्दा हूँ।



आपकी समीक्षाओं/ प्रतिक्रियाओं की अपेक्षा में--->

---श्री दया प्रकाश पाठक (दया संग्रह)---



कविता - वफ़ादारी


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