कविता - बांँझ नारी की व्यथा...(एक प्रयास)

Medhaj news 18 Jul 20 , 15:35:16 Special Story Viewed : 2732 Times
poem2.png

मेरी पिछली कविता पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें---->
1) धूप में पथिक...​
2) आओ फिर...
3) झुग्गियां...
4) पत्थर दिल...
5) हँसने दो .....
6) बया...


काँपती नित कोख मेरी

बाँझ सुन देह सहमी है' मेरी।

आँगन सूना पतझड़ से तन 

न स्पंदन , न मुस्काता मन।


अवसादों ने डाला डेरा

मन उपवन अब लगे न मेरा।

क्यों चारदिवारी में कैद हुई?

मैंक्यूँ इतनी मजबूर हुई?

ममता अपनी कहाँ लुटाऊं?


सपने में ही माँ बन जाऊँ.

किसको लोरी आज सुनाऊँ?

किससे में निज प्यार जताऊँ?

सबकी नजरें क्यों बदल गई?

बस,बाँझ बन कर रह गई।

दम तोडता नारीत्व मेरा


मुँह मोड़ता अपनत्व मेरा।

काश फिर इक पौध लगा पाती

आँगन में खुशियां मैं पाती

फिर से कोख धन्य हो जाए

फिर से मेरी गोद भर जाए।



----डा.बंदना जैन(कोटा,राजस्थान)----


    30
    0

    Comments

    Leave a comment



    Similar Post You May Like

    Trends

    Special Story