कविता - बांँझ नारी की व्यथा...(एक प्रयास)

Medhaj news 18 Jul 20 , 15:35:16 Special Story Viewed : 1153 Times
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1) धूप में पथिक...​
2) आओ फिर...
3) झुग्गियां...
4) पत्थर दिल...
5) हँसने दो .....
6) बया...


काँपती नित कोख मेरी

बाँझ सुन देह सहमी है' मेरी।

आँगन सूना पतझड़ से तन 

न स्पंदन , न मुस्काता मन।


अवसादों ने डाला डेरा

मन उपवन अब लगे न मेरा।

क्यों चारदिवारी में कैद हुई?

मैंक्यूँ इतनी मजबूर हुई?

ममता अपनी कहाँ लुटाऊं?


सपने में ही माँ बन जाऊँ.

किसको लोरी आज सुनाऊँ?

किससे में निज प्यार जताऊँ?

सबकी नजरें क्यों बदल गई?

बस,बाँझ बन कर रह गई।

दम तोडता नारीत्व मेरा


मुँह मोड़ता अपनत्व मेरा।

काश फिर इक पौध लगा पाती

आँगन में खुशियां मैं पाती

फिर से कोख धन्य हो जाए

फिर से मेरी गोद भर जाए।



----डा.बंदना जैन(कोटा,राजस्थान)----


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    Comments

    • Very good

      Commented by :Kunal chandra
      22-07-2020 19:36:41

    • Good

      Commented by :Sandeep kumar yadav
      20-07-2020 13:12:51

    • Nice line

      Commented by :Nidhi Azad
      18-07-2020 21:43:07

    • Nice line

      Commented by :Rinku Ansari
      18-07-2020 19:54:52

    • Nice line

      Commented by :Pravesh Kumar Satyarthi
      18-07-2020 19:19:28

    • nice line

      Commented by :Sushil Kumar Gautam
      18-07-2020 18:01:21

    • Nice line

      Commented by :BAL GANGADHAR TILAK
      18-07-2020 17:38:59

    • Really nice poem stating the problem of woman

      Commented by :Nidhi azad
      18-07-2020 16:52:01

    • Really nice poem stating the problem of women

      Commented by :Aditya Yadav
      18-07-2020 16:46:42

    • Nice

      Commented by :Harendra Singh
      18-07-2020 16:37:09

    • Very nice poem

      Commented by :Pintoo kumar jhansi
      18-07-2020 16:08:43

    • Nice poem

      Commented by :Ajay Kumar Azad
      18-07-2020 16:01:29

    • Nice

      Commented by :BHUPENDRA MAHAYACH
      18-07-2020 16:00:34

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