कविता - क्या से क्या हो गए

Medhaj News 26 Jul 20 , 11:39:27 Special Story Viewed : 1151 Times
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एक घर के ऊपर कई घर हो गए,

इस तरह से दड़वों के अंदर हो गए।


दालान, बरामदा, अटारी छज्जे और आंगन,

घर के ये सारे हिस्से बेनजर हो गए।


तुलसी का पौधा आंगन से जो  बालकनी में आया,

यूं लगा जैसे कि हम घर से बेघर हो गए।


गांव के शब्द सूप, सिलबट्टा, लकड़ी का पीढ़ा,

शहर की शब्दावली से बाहर हो गए।


बक्से और संदूक का भी गुजर गया अब जमाना,

कांट छांटकर बार्डरोब बनाने में माहिर हो गए।


घोर दुपहरी में अब तिमिर का साया है,

वासना की बूंद में हम सिकन्दर हो गए।




----डॉ हृदेश चौधरी(आगरा)-----

  लेखिका, सोशल एक्टिविस्ट


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    Comments

    • Nice

      Commented by :Sandeep kumar yadav
      29-07-2020 22:13:51

    • Nice Poem

      Commented by :Vartika Mishra
      27-07-2020 11:04:34

    • Excellent

      Commented by :D N Yadav
      26-07-2020 22:44:09

    • Heart touching poem. Village memories.

      Commented by :Ajay Kumar Azad
      26-07-2020 22:30:08

    • Excellent

      Commented by :AJEET Kumar
      26-07-2020 14:04:34

    • Nice Poem

      Commented by :BHUPENDRA MAHAYACH
      26-07-2020 12:43:34

    • Nice poem

      Commented by :Jitendra kumar Bajpayee
      26-07-2020 12:29:14

    • Good poem

      Commented by :Rakesh kumar
      26-07-2020 12:28:30

    • excellent

      Commented by :M.K.Pandey
      26-07-2020 12:16:03

    • True line..

      Commented by :Ajeet Singh
      26-07-2020 11:56:03

    • true lines

      Commented by :amit maan
      26-07-2020 11:50:55

    • Nice poem

      Commented by :Rinku Ansari
      26-07-2020 11:46:54

    • Nice

      Commented by :Harendra Singh
      26-07-2020 11:44:17

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