कविता - जीवन का उजाला

Medhaj News 14 Aug 20 , 10:58:24 Special Story Viewed : 3287 Times
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चाहे नजर ना आये कहीं उजाला,

चाहे लगा हो हर चौखट पर ताला। 

चाहे कहती रहे दुनिया मुझे मतवाला, 

भरकर नैनों में दिव्य ज्ञान ज्योति। 

हर गलत बात पर कलम जरूर उठाऊंगा,

पर मैं दीया जरूर जलाऊंगा। 



चाहे रहे सदा मेरे जमाना विरूद्ध,

चाहे कितनी मर्जी हो राहें अवरूद्ध। 

चाहे रोकने आ जाएं मुझे फरिश्ते खुद,

भरकर तूफानों सा हौसला सांसो में। 

मैं कोशिश कर हर डूबते को बचाऊंगा,

पर मैं दीया जरूर जलाऊंगा। 



चाहे करना पड़े मुझे खुद का खात्मा,

चाहे धधकती रहें मेरी व्याकुल आत्मा। 

चाहे साथ ना दे मेरा दयालु परमात्मा,

जिंदा हूँ जब तक जमीन पर मैं तो। 

हर हाल में अपना मानव धर्म निभाऊंगा,

पर मैं दीया जरूर जलाऊंगा। 



मेरी प्यारी रूह तू मेरा साथ देना,

डूबने लगूं जब मुझे अपना हाथ देना। 

नजर आऊं भीड़ से अलग सूरज सा,

औरों से अलग मुझे कुछ तो बात देना। 

दर्द भरा है अपनों की खातिर दिल में इतना,

के सांसे है जब तक, तब तक प्रेम गीत गाऊँगा,

पर मैं दीया जरूर जलाऊंगा।
 



-----संकेत (मुंबई)------


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