कविता - तन्हाई

Medhaj News 6 Jul 20 , 11:27:53 Special Story Viewed : 6485 Times
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तन्हाई तन्हाई और तन्हाई, एक गीत गा रही है

और ये बात, मैं किसी से कह भी नहीं सकता

जिसे नज़र ढूंढती, अंधेरों में खोई उसकी परछाई।

बहती नदी सी है वो, बहती ही जा रही है।

एक शोर उठ रहा है किनारों से,

भर दे कोई तन्हाई को सरोवर सा,

ये गुनगुना रही है।


तन्हाई तन्हाई और तन्हाई, एक गीत गा रही है।

दो किनारों सी है जुदाई,

नामुमकिन है दोनों का मिलना, लहरें बता रहीं हैं।

मेरी तन्हाई सी शान्त है लहर इसकी,

किनारों पर लगे पत्थरो से हाल बता रही है,

महसूस करे भी तो कैसे पत्थर ही तो है,

अपनी बेरुखी जता रही है।


तन्हाई तन्हाई और तन्हाई,

एक गीत गा रही है।

ना थके है, पाव कभी

ना तो हिम्मत अभी हारी है

मैंने देखे है कई दौर

अभी भी संघर्ष जारी,


तन्हाई तन्हाई और तन्हाई,

एक गीत गा रही है।



-----अखिलेश कुमार(बलिया)-----



 


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