#Poem - मन का गागर

Medhaj News 14 Aug 20 , 17:47:44 Special Story Viewed : 3024 Times
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आज तुम्हें अर्पित करने को,

प्रिय मन का गागर लाई हूँ।

बड़े यत्न से भरा जिसे,

भावों का सागर लाई हूँ।

      ****

मत पूछो प्रिय इसका परिचय,

इसमें है मधुरस का संचय।

आज मधुरता सारी लेकर,

मैं तुम्हें दिखाने आई हूँ।


      ****

अंतस्तल में मुझे बसा लो,

मेरे मन की प्यास बुझा दो।

अधर लगा लो जो तुम साथी,

सबसे अप्रतिम सुख पाई हूँ।

      ****

कब से इसे दबाए बैठी,

अपने हृदय छिपाए बैठी।

आज इसे मैं तुम्हें सौंपकर

अपना सब वापस पाई हूँ।


      ****

मत पूछो इसकी ऊँचाई

जान सको जानो गहराई,

गागर सा मेरा मन - दर्पण

मैं बस इसकी परछाई हूँ।

      ****


            ---डा.बंदना जैन(कोटा,राजस्थान)----



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