कविता - मेरे हाथ की लकीरें

Medhaj News 25 Jul 20 , 16:57:38 Special Story Viewed : 16414 Times
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मेरे हाथ की लकीरें क्या,

बदलेंगी मेरी रुठी किस्मत,

जब किस्मत पहले से ही कुछ जुदा थी ।

जिसमें लिखा तो है, मिलेगी सफलता मुझे,


लेकिन मंजिले दिखाई दी, कही गुम सी मुझे ।

लोगों से सुना है, मंजिल और सफलता,

दोनों मे बहुत ही गहरा, होता है नाता ।

लेकिन सफलता उन्ही को मिलती है,


जिनकी मंजिलों से रहता है याराना;

जो बंद हथेली है, मेरी उसमे,


ना मिल पाने से सहमी मेरी, 

कैद है सफलता, एक पपीहे सी ।

मेरे हाथ की लकीरें क्या,


बदलेंगी मेरी रुठी किस्मत,

जब किस्मत पहले से ही कुछ जुदा थी ।

हाथों की लकीरो के, मध्य में किस्मत मेरी ,

हसती-मुस्कराती दिखाई दी, एक बंद पिंजरे सी !


जो हमेशा खुलती है बस मेंहनत की तपिश से,

निरन्तर कोशिश करते रहने वालों की ,

किस्मत की सीढ़ी हमेशा उचांई को छूती है

मेरे हाथ की लकीरें क्या,


बदलेंगी मेरी रुठी किस्मत,

जब किस्मत पहले से ही कुछ जुदा थी ।  



------Ajay(H.O)-----



मेरी पिछली कविता पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें----> आत्मसमर्पण​



 


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