कविता - मेरी अभिलाषा

Medhaj News 22 Jul 20 , 14:03:12 Special Story Viewed : 5809 Times
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कर्म की डगर पर, अभिलाषाओं से घिरा हूँ |

तमन्ना है कुछ पाने की, मगर खुद में उलझा हूँ || 


कोशिश बहुत की, अपनी इच्छाओं पर अंकुश लगाने की,

पर सायद किस्मत के दरवाजे पर बिखरा हुआ हूँ |


मुकम्मल मेरा जहां हो, ख्वाहिश यही है मेरी |

मगर सांसारिक मोह से डर कर टुटा हुआ हूँ ||


भावनाओं के समुन्दर जैसा मन है मेरा |

उस पर बांध लगाए ख़ामोशी साधा हुआ हूँ ||


चाहतों के इस भवर में एक रोशनी का इंतजार है |

अंधेरों से लड़ कर खुद अँधेरा बन चूका हूँ ||


हालात के कदमों पर समंदर नहीं झुकते है |

टूटे हुए तारे कभी ज़मीन पर नहीं गिरते  है
  ||


बड़े शौक से गिरती हैं लहरें समंदर में,

पर समंदर कभी लहरों में नहीं गिरते है ||




----अखिलेश कुमार(बलिया)----



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